परिचय --- ओमप्रकाश पाण्डेय
स़ंक्षिप्त परिचय
भारतीय स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात इन्होंने कविता और लघु कहानियाँ नियमित रूप से लिखना शुरू किया. अपने सेवा काल के दौरान भी इन्होंने कई कहानियाँ व कविताएँ लिखी, जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये. बैंकिंग से सम्बन्धित आपने बहुत सारे लेख लिखे. उनमें बिशेष कर "भावी बैंकिंग का स्वरूप एवं चुनौतियां", " ग्राहक सेवा " , " Problem of Non-Performing Assets" आदि लेख प्रमुख हैं. आपको अपने बैंकिंग सम्बंधित लेखों के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं.
आपकी कविताओं में प्रमुख कविताएँ हैं, आंचल, दृष्टि, आओ चलो आज मोहब्बत करते हैं, आखिरी खत आदि. आपकी कविताओं में मानवीय संवेदना, पर्यावरण के प्रति चिंता व समाज में व्याप्त कुरितियों (भ्रुण हत्या में) के प्रति जागरूकता प्रकट किया गया है. आपने करीब पांच सौ से अधिक कविताएँ लिखी हैं. आपकी दो कविता संग्रह " ऑंचल " और "किलकारियां" प्रकाशित हो चुकी हैं.
आपके लघु कहानियों में भी इन्हीं भावनाओं को आधार बना कर, विभिन्न पात्रों द्वारा संदेश देने का सफल प्रयास किया गया है. आपने करीब दो सौ से अधिक लघु कहानियाँ लिखी हैं. उनमें से प्रमुख हैं " मार्निंग वाक" ( दस कहानियाँ), आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा ( दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि. आप कई साहित्यक मंचों जैसे अग्नि शिखा मंच, मनपसंद कला व साहित्य मंच, खारघर चौपाल, आई. टी.एम. काव्योत्सव आदि से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. आप मूलतः गोरखपुर उ. प्र. के निवासी हैं, परन्तु आजकल खारघर, नवी मुम्बई में रहते हैं.
पता
B -403, Elite Home, Plot No. -52, Sector- 35 E, Kharghar, Navi Mumbai -410210
कथरी ( लेवा/ गुदरी) की आत्मकथा --
ओमप्रकाश पाण्डेय
कथरी, आज की पीढ़ी ने तो मेरा नाम ही नहीं सुना होगा. समय के साथ- साथ बहुत कुछ पुराना भूल जाता है या अपने आप गायब हो जाता है और नयी- नयी चीजें/ शब्द प्रचलित हो जातीं हैं. यही प्रकृति का नियम है और यह अनादि काल से होता आया है और होता रहेगा. इसमें कुछ भी नया नहीं है. बहुत से चीजों/ शब्दों के साथ ऐसा हुआ है, तो मेरे साथ भी हुआ तो क्या आश्चर्य!
हाँ तो बात हो रही थी मेरी, यानि कथरी की. आज भी हिन्दी की एक कहावत बहुत ही प्रचलित है " गुदरी के लाल" अर्थात बहुत ही गरीबी में पला, बड़ा हुआ एक बहुत बड़ा आदमी. तो साहब मेरा निवास सामान्यतः बहुत ही गरीब लोगों के घर में हुआ करता था. आज तक किसी ने " गद्दे का लाल " कहावत नहीं सुना होगा. लाल तो गुदरी में ही पैदा होते थे. इसीलिए जब से गद्दे का प्रचलन शुरू हुआ है, लाल पैदा होने बन्द हो गये. अब तो , साहब और नेता पैदा होते हैं. देखिए मैं अनावश्यक लाईन से भटक गया. तो एक जमाना था जब यह देश बहुत ही गरीब हुआ करता था और कुछ ही लोगों के पास ही इतना पैसा होता था कि वे रुई के गद्दे व रजाई खरीद सकें अथवा बनवा सकें. तो साहब ऐसे सारे गरीब लोगों के घर में ही मेरा निवास था और मैं उनका बहुत प्रिय हुआ करता था.
अब कोई भी पूछ सकता है कि मेरी विशेषता क्या थी? तो साहब मुझे बनाने में एक पैसा भी खर्च नहीं होता था, न तो मुझे बाजार में खरीदना पड़ता था और न तो मैं बाजार में कोई बिकने वाली चीज ही थी. बल्कि मुझे तो अपने ही घर में महिलायें बड़े प्रेम से अपनी प्यारी - प्यारी ,नाजुक व कोमल हाथों से, अपनी पुरानी साड़ियों व चादरों से सिल कर बनाती थीं.
चलिये तो आज अपना किस्सा सुनाते हैं. उस समय चूंकि अधिकांशतः लोग गरीब ही होते थे तो उनके घर की महिलाएं सूती साड़ियां ही पहनती थीं. उस समय सूट - सलवार या जीन्स- टाप, का नाम भी कोई नहीं जानता था. मैक्सी या नाईट सूट की तो बात ही न करो. तो साहब धनी हो या गरीब, महिलाऐं रोज सूती साड़ियां ही पहनते थीं ( शादी व अन्य विशेष अवसरों पर कुछ बढ़िया जैसे रेशम की साड़ियां भी पहनी जाती थी) . जो भी साड़ी पुरानी हो जाती तो उसे फेकने की जगह, धो कर, सुखा कर ठीक से रख दिया जाता था. जब आठ- दस साड़ियां इकट्ठी हो जाती थी तो महिलाऐं एक दिन दोपहर में आराम से बैठती थीं. उनके पास मोटा, लम्बा सुई और मोटा धागा होता था. सभी साड़ियों को एक के उपर एक, ठीक से, बराबर करके रखा जाता था. फिर साहब मुझे सिलने का कार्यक्रम शुरू होता था. सिलने का यह काम महिलाऐं अपने घर के सारे काम करने के बाद, दोपहर में आराम से बैठती थीं और तब वे मुझे सिलती थीं. कभी- कभी पड़ोस की भी कोई महिला आ जाती थी सिलने में अपना हाथ बटाने.
सामान्यतः एक दिन में एक कथरी सिल कर तैयार हो जाता था. देखिए बिना किसी खर्चे के मैं बन कर तैयार हो गया. अब आप मुझे चाहें तो बिछा सकते हैं अथवा जाड़े में ओढ़ सकते हैं. रोज- रोज प्रयोग होने से मैं गन्दा भी हो जाता था, तब महिलाऐं आराम से मुझे धो कर सुखने डाल देंती. मैं दो दिनों की कड़ी धूप में सूख हो जाता था. जिन लोगों के पास थोड़ा सा भी पैसा होता था वे मेरे उपर एक चादर भी बिछा देते थे और ओढ़ने वाले कथरी पर खोल चढ़ा देते थे.
जब मेरी उपयोगिता खत्म हो जाती थी तो लोग मुझे मैदान में फेंक देते थे और मैं जहाँ से आया था ( यानि कपास के रूप में मिट्टी से), उसी मिट्टी में मिल जाता था. न कोई प्रदूषण, न तो पर्यावरण को कोई क्षति. क्या आप आज फोम से बने गद्दों से वैसा ही प्रदूषण रहित व्यवहार की अपेक्षा कर सकते हैं!
( यह मेरी मौलिक रचना है -- ओमप्रकाश पाण्डेय)
06.06.2024
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