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सोमवार, 22 जुलाई 2024

पारमिता षडंगी जी की 5 कविताएँ



नाम _ पारमिता षड़ंगी (लिखने की नाम. Legal name Archana Mishra)
पिता_ बंशीघर षडगीं
पति- स्वप्नेन्दु मिश्र
सहर _ कांदिवली, मुंबई
जन्म तिथि_ १३.४.१९७२
जन्म स्थान_निमापडा , ओडिशा
लेखनी_ ओडिआ और हिंदी भाषा में कहानी, कविताएँ, समीक्षा, और अनुवाद 
प्रकाशित रचनाएं_ 
*कहानियों 
पाँच ओड़िआ में एक हिंदी में 
1- संपर्क र पाहाच रु ओह्लाइला परे (लेखालेखि प्रकाशन, भुवनेश्वर 2014 )
2- मुँ न थिला बेले (दक्ष प्रकाशन, भुवनेश्वर,2017)
3- अंतराले यह पांडुलिपि ब्रहृमपुर साहित्य परिषद द्वारा पुरस्कृत (2017) और प्रकाशित (2018)
4- विरोधाभास (सृजन इंडिया प्रकाशन,कटक,2017 )  
5- अभिधा ( पक्षीघर प्रकाशन भुवनेश्वर,2023)

* कविता  में (ओड़िया)
1- चाल किछि आंकिबा (पश्चिमा प्रकाशन, भुवनेश्वर,2022)
2- एबे तुम्हें नाहँ ( बम्बे ओमेन्स ओड़िया एसोसिएशन, मुंबई 2022)
*हिंदी में
 1- इज्या ( कविता संकलन,प्रलेक प्रकाशन, मुंबई 2021)
  2- संबित के पास जब मैं नहीं थी(कहानी संग्रह, अंतरंग प्रकाशन लखनऊ,2023)
 * अनुवाद 
1-जवाहर टनल (अग्निशेखर जी के हिंदी कविता संकलन के ओड़िया में अनुवाद ,पश्चिमा प्रकाशन,2021)
2-सुत्रधार ( केंद्र साहित्य और ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त सुप्रसिद्ध कवि डॉ बंशीघर षड़ंगी के कविता संकलन “सुत्रधार” का ओड़िआ से हिंदी भाषा में अनुवाद बोधि प्रकाशन, जयपुर 2023)
3- कविता र ऋतु (अमरजीत कौंके जी के हिंदी कविता संकलन का ओड़िआ में अनुवाद, पक्षीघर प्रकाशन, भुवनेश्वर,2023)
4- चंद्रकु खोजु खोजु (मिथिला के सुप्रसिद्ध कहानी कार प्रदीप बिहारी जी के द्वारा लिखी गई चुनिंदा कहानियों के ओड़िआ में अनुवाद, पश्चिमा प्रकाशन, भुवनेश्वर 2024)
6- रात बितने के बाद (केंद्र साहित्य और ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त सुप्रसिद्ध कवि डॉ. फनि महांति जी के चुनिंदा कविताओं को हिंदी में अनुवाद, सोपिजेन प्रकाशन, 2024)
7- सेमाने जेतिकि झरका खोलंती (अनील मिश्रा जी के हिंदी कविताओं के ओड़िआ में अनुवाद, प्रकाशिन अपेक्षा में)
7- सरोकार ( मिथिला के सुप्रसिद्ध कहानी कार प्रदीप बिहारी जी के केंद्र साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार प्राप्त कहानी संकलन का ओड़िआ में अनुवाद, प्रकाशिन अपेक्षा में)
8- पर्णसुक्त – संजय बरूडे द्वारा मराठी में लिखी गई कविता संकलन की ओड़िया अनुवाद (प्रकाशन अपेक्षा में)
9- हिंदी कविता संकलन “इज्या” का गुजराती और मराठी भाषा में अनुवाद हो कर प्रकाशित। गुजराती भाषा में अनुवादित “इज्या” के लिए हीना मोदी जी को गुजराती साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ है। मराठी भाषा में अनुवादित “इज्या” के लिए रचनाजी को “ग्रंथरत्न” “अग्रवन्” और “राज्यस्तरीय युगप्रवर्तक साहित्य पुरस्कार” प्राप्त हुआ।
सम्मान_ 
*साहित्य दर्पण श्रेष्ठ गाल्पिका सम्मान 
• तिसरा किताब ब्रह्मपुर साहित्य संसद द्वारा  पुरस्कृत , 
  *बॉम्बे ओडिया महिला संगठन (Bowa) द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में सम्मानित, 
• वीरभाषा हिन्दी साहित्य पीठ द्वारा सम्मानित, 
*युबा उत्कर्ष साहित्यिक मंच द्वारा ‘काव्य गौरव सम्मान’ प्राप्त|
  *प्रवासी साहित्य सम्भार से सम्मानित
  *ओड़िया साहित्य महामंच से सम्मानित
   *विरजा साहित्य सदन से सम्मानित
   *स्टोरी मिरर से कविता केलिए सम्मानित
   *ईन्कडियू लिटफेस्ट से सम्मानित
   *विरजा साहित्य संसद से सम्मान पत्र प्राप्ति 
   *राष्ट्रिय नव साहित्य कुंभ से सम्मान  पत्र प्राप्ति
    * कुछ बात कुछ जज़्बात की मंच से अहिल्याबाई होलकर सम्मान प्राप्त 
    *इंटरनेशनल प्रेस कम्युनिटी , आइपीसी न्यूज़ 24 के सौजन्य से कविता पाठ और सम्मानित
• के. बी. हिंदी सेवा न्यास ( उत्तर प्रदेश) से हिंदी कविता संग्रह “इज्या”  को पुरस्कार प्राप्त 
  *विद्योत्तमा फाउंडेशन से नविद्योत्तमा साहित्य आराधना सम्मान प्राप्त और पुरस्कृत 
* विगंस पब्लिकेशन के तरफ़ से कविता संकलन “इज्या” को गोल्डन बुक अवार्ड सम्मान प्राप्त 
*काव्यपाठ और संचालन
* हिंदुस्तान प्रचार समिति और महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित
सम्मेलन में “ओडिआ कहानी के परिवर्तित धारा “ के उपर आलेख पाठ।
*ओड़िया साहित्य अकादमी के तरफ़ से मुम्बई में काव्य पाठ
*इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में संचालन और काव्य पाठ और सम्मानित 
*परिचय फाउन्डेशन द्वारा आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल में संचालन और काव्य पाठ और सम्मानित 
*प्रवासी साहित्य संभार के तरफ़ से आयोजित बहुभाषी कवि सम्मेलन में संचालन और काव्य पाठ 
*राष्ट्रीय नव साहित्य कुंभ के तरफ़ से आयोजित कवि सम्मेलन में संचालन और काव्य पाठ
*विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम के तरफ़ से आयोजित कवि सम्मेलन में संचालन और काव्य पाठ 
*नेशनल प्रेस कम्युनिटी , आइपीसी न्यूज़ 24 के सौजन्य से आयोजित कवि सम्मेलन में काव्य पाठ
*मुंबई प्रेस क्लब में आयोजित कवि सम्मेलन में काव्य पाठ
*ओड़िशा आकाशवाणी में कहानी पाठ और संचालन    
फोन_ ९८६७११३११३ (9867113113)


*************



(१)
रोज़ी दास
तेरे धोखे ने दर्द का पैमाइश
समझा दिया
ख्वाबों का एक 
हुजूम था
फिर भी दिल तनहा था

दिल में दफन हैं लाशें 
नन्हे यादों की
घायल पडी  है अरमानों
किस्तों में है जींदगी 

बैठा हूँ नगमों के 
हुजूम मैं
पर दर्द मेरे
‘गैर’ का एहसास लिए
तनहा तड़पते हैं।
(२)
चलते चलते,खुली आँखो से
सपना देख लेती है 
रोजी दास
स्वप्नों के नादान सड़क पर
खड़ा हैं राजकुमार 
हाथों में गुलाब लिए
फिर भी रोजी के रुमाल के
धागों में आँसुओं की बूँदे

आँखोँ में गढ़ती है
अपनी काया
आईना न होते हुए भी
देख लेती है खुद को
जुगाड़ कर लेती है
थोड़ी सी रहस्यमय हँसी 
कंकाल के मानचित्र से
(३)
रोजी दास
तुम्हारी आँखे 
ठीक एक नदी जैसी
जो सूर्य के आने से पहले
जाग जाती है
ब्रह्मचारिणी जैसी ,
अकेली चलती रहती
किनारों को अनदेखा कर

रोजी 
तुम्हारी आँखे,
दुश्मन है तुम्हारे सपनों की
प्यार को पुण्य में बदलने
तक इंतजार नहीं करती
(४)
रोजी दास
तुम्हारे सपने
तुम्हारी इच्छाओं में नहीं मिलते
अँधेरे के किचड़ में से
रात सा कमल
खिलने नहीं देता

रोजी दास
थोड़ी देर के लिए
अपनी आँखों को बंद कर लो
हो सकता है , तुम देख लो
अनादि काल से वो
सम्मोहित प्यार से भरा 
एक शुन्य स्थान और
बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर
चांदनी रात में,
चांद के चित्र को धारण कर
जलते हुए फटा कागज में
हाथ सेकते हुए बुढे को।
(५)
रोजी दास

किसी एक शैत्य
शून्य रात में
तुम्हारी रहस्यमय आंखों में 
प्रेम की तीव्र विस्वन
तुम्हारी बाहों के बंधन में

कल मैं और 
मेरे साथ गुज़ारे हुए
बेकार दिन सारे
सूखे बिस्तर में पड़े थे 
तुम से मिलने की तृष्णा को लेकर

अब मेरे शरीर में
तुम्हारे होंठों के हस्ताक्षर
धो दिए सारे कलंक मेरे
ठीक पहली बारिश ज़ैसे
सभी संदेह के अंधेरे में
पहली किरण
तुम्हारा स्पर्श 

एक अनोखी खुशी क़ी
यंत्रणा में
न्यून है कलंक
स्वीकार है मुझे
हाँ, मैं करता जा रहा हूँ
एक अर्वुद आनंदमय पाप
(६)
रोजी दास
मैं तुम से कितना प्यार करता हूँ
उस दिन शायद 
तुम्हें ठीक से नहीं बोल पाया
राहू काल चल रहा होगा
इसलिए गले में दब कर रह गए
शब्दों के सारे सामर्थ्य

पेट,मन या हृदय
हर जगह,तरह तरह के भूख 
कौन नाप सकता है उसे ?
अभी ,मन करता है
इस शरीर के हर एक कमरों के
द्वार को खोल कर 
आवाज दूँ तुम्हें,
आओ, देखो ! इन कमरों में 
कुछ अपेक्षाएं, कुछ प्रतारणा
चुपचाप रो रहें हैं

न भूलने वाली यादें
हृदय को घात करने लगी है
सर्दरात मेरे देह में
उत्ताप भरने लगे है
फिर भी मृत्यु तक 
जीने को मज़बुर हूँ

प्रेमिका को शाय़द 
मिल जाता है
वादा तोड़ने के लाइसेंस
अब भी उस गली के 
दोनों तरफ के फैले हुए
रात कि रानी की महक में
तुम्हारे मुंह से निकल रही थी 
‘विदाय’ शब्द 
मेरे मृत सपनों की खाल पहनकर

अब तो , मैं ऐसा एक फटा हुआ
पृष्ठ हूँ
किसी किताब की
जिसे उजाले में भी 
पढ़ा नहीं जा सकता

रोजी दास
चारों तरफ फ़ैल रहा
एक गंध
जल रही है ‘ विश्वास’ शब्द
उसके अंदर तुम धीरे धीरे
बदल रहे हो 
प्रतारणा की प्रतिध्वनि।

***

देवी नागरानी जी की कहानी कमली






कहानी
कमली
-देवी नागरानी  
‘अरी ओ कमली, मेरा हुक्का तो भर दे. दो चार कश लगा लूं, तो धांय धांय करता दिमाग कुछ शांत हो.’ -नानी ने हिदायती सुर में कुछ इस तरह आवाज़ दी कि आंगन से होता हुआ उनका सन्देश रसोई घर में उसके कानों तक आ पहुंचा.
‘अम्मी बस अभी आई कि आई’, वहीं से आवाज़ देते हुए कमली ने कहा.
 ‘अरी मुर्दार तू मेरे काम के लिए कभी भी फारिग नहीं होती. टालती रहती है, नखरे भी तो कोई कम नहीं है तेरे, आए दिन बढ़ते ही जा रहे हैं. अब तू कमली से फिर कमसिन जो हो गई है.’
‘नानी बस दो चार बर्तन और हैं, मांज कर आती हूँ.’ कमली की आवाज़ रसोई घर से बाहर नानी के कानों तक आई.
‘तेरी आवाज तो बाहर आ सकती है, पर तू नहीं आती. बर्तन करने का दावा करती है. खाना खाती है तो बर्तन भी करेगी. कहकर क्यों सुनाती है? क्या खाना सुना कर खाती है? जाने क्या हुआ है आजकल के ज़माने को. बच्चे तो बच्चे, नौकरों की भी ज़बान चलने लगी है.’
‘देवकी, ओ देवकी तू ही आकर हुक्का बनादे, इसे तो फुर्सत ही नहीं मिलती मेरे काम के लिए. ज़रा देखना तो, रसोई में कोयले तो नहीं बुझ गए.’
‘आई नानी….!’ मैं अपने किताब बिस्तर पर ही छोड़ कर बाहर आ गई. तुरंत न आने का नतीजा जानती थी.
‘तू भी बहरी हो गई है. मैं तो हिंदुस्तान में आकर ज्यादा परेशान हो गई हूँ.’
‘हों गई होंगी, ज़रूर हुई होंगी. सिंध में चार चार नौकर-चाकर जो तुम्हारे आगे पीछे घूमा करते थे. यहाँ तो बिचारी यह अकेली ही है, किस काम को देखे....किस काम को छोड़े!’ सोचा, पर कह न पाई. शामत को दावत देना किसे भला लगता है.
मेरी बात मेरे मुंह में ही रह गई. नानी की रोबदार आवाज तो थी ही, पर नाराज़गी में उसमें से कुछ और ही स्वर निकलते थे. कुछ और सुनूं इससे पहले हुक्का उठाकर हौदी की ओर चल पड़ी. पुराना पानी गिराया, ताजा पानी भरा, टोपी को उंडेलकर राख निकाली, फिर अंगार डालने के लिए रसोई घर में गई.
कमली ने आंखें उठाकर मेरी ओर देखा-लगा वह बहुत ही निर्बल हो गई थी..शायद काम का बोझ उससे उठाया नहीं जा रहा था, और ऊपर से इन वज़नदार शब्दों की बौछार! कमली मेरी हम उम्र थी, नानी की नातिन मैं भी थी, और वह भी. पर फर्क था. मैं सेज पर सोती, वह मेहनतकशी की चक्की में पिसती रहती. मैं पढ़ाई के लिए स्कूल जाती, वह रसोईघर का काम संभालती.
अपनी पीठ पर मेरे हाथ का स्पर्श महसूस करके उसकी आँखें गीली हो गई. लगा पुराने ज़ख्मों से कुछ रिस रहा हो. पर वह चुप थी. खामोशी भी कितनी अजीब होती है. अपनी ही भाषा में कितनी दास्तानें एक ही बार मैं बोल जाती है. हां यह और बात है, कि कोई समझे, कोई ना समझे, कोई महसूस करें, कोई ना करे.  
‘कमली  तुम बर्तन मांज कर रखती जाओ, मैं धोती जाती हूँ. इस तरह काम जल्दी ख़त्म होगा. फिर तुम जाकर थोड़ा आराम कर लेना.  
‘ नहीं बीबी, मैं कर लूंगी. आप नानी का हुक्का भर दीजिये....’. और उसकी नाक की सूं ...सूं...ने बहुत कुछ बहने से रोक लिया!’  इतना तो मेरे बाल मन ने जान लिया था.
         मैंने हुक्का लाकर नानी की खाट पर रख दिया और अपने कमरे की ओर जाने के लिए कदम बढ़ाया ही था कि सामने नानू जान आँगन में आते हुए दिखाई दिए.
‘सलाम नानू जान,,!’ मैंने भागकर अपनी बाहें उनके इर्द गिर्द लपेटते हुए कहा.
‘सलाम बेटा, खुश रहो! कहो पढ़ाई ठीक-ठाक चल रही है ना?’ नानू ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए पूछा.
‘हाँ नानू, बिलकुल ठीक चल रही है.’  कहकर में चलने लगी, पर मेरे पाँव रुक गए.
‘लड़कियों को पढ़ाना बेकार है. दिमाग खराब हो जाता है उनका……’ नानी ने एक बड़ा कश लेते हुए बिन मांगी अपनी राय सामने रखी.
‘क्यों न पढ़ें? ज़माना भी तो बदला है कि नहीं? मैं तो कहता हूँ कि कमली को भी इसके स्कूल में दाखिल करवा दो. दोनों का साथ भी हो जायेगा और पढ़ाई भी.’
‘अब चुप भी करो, ज्यादा दिमाग खराब मत करो उसका. वह भी पढ़ेगी तो घर का काम कौन संभालेगा? मैं तो बोल कर फंस गई.’  और नानी की बड़बड़ाहट  मेरे कानों तक रेंगती हुई पहुंची, जिसमें कुछ कड़वे, कुछ कसैले शब्द थे जो पिघले डामर की तरह मेरे कानों में तैरते रहे.
‘अब बात को आगे मत बढ़ाओ !’ नानू ने अपने कमरे की ओर रुख करते हुए कहा.
‘ कमतर जात के लोग हैं…. कितना भी भला करो भुला देते हैं. ज़माना ही बदल गया है.  न वे लोग रहे हैं, न ही वह खुशबू बाकी रही है किसी में.’
‘अरी भाग्यवान अब घड़ी पल चुप भी हो जाओ. बिचारी दोनों लड़कियां क्या कुछ नहीं करतीं? तुम्हारी हर फरमाइश तो पूरी करती हैं, पल दो पल देरी तो हो ही जाती है. तुमने तो उम्र काटी है, इनके सामने तो पूरी जिंदगी पड़ी है. मुझे तुम्हारी ये बातें बिल्कुल नहीं भाती, और न ही तुम्हें ऐसा करना शोभा देता है.
‘ नहीं अच्छी लगती तो……!....
         अभी नानी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि नानू ने रोबदार आवाज में कहा-’अपने ही घर में आदमी कुछ पल सुकून के बैठे, ऐसा तो मौसम ही नहीं रहा. काम से लौटकर घर आओ तो घर-घर लगना चाहिए. यहां तो हरदम तुम्हारी शिकायतों की दुकान खुली रहती है!’
‘हां हां अब यह मेरी दुकान हो गई, और वह तुम्हारी...यही कहना चाहते हो न?’
‘अब बस भी करो. मैं जाकर लेट रहा हूँ!’
‘खाना तो खालो. क्या यूं ही भूखे पेट लेट जाओगे?.....‘कमली, अरी ओ कमली अपने नानू को खाना तो देना, जल्दी हाथ पाँव चला.’ नानी की बुलंद आवाज़ सुनने में आई.
‘जी आई नानी, अभी आई. तवे से रोटी उतार कर लाती हूँ.’
         मैं इतनी बड़ी तो न थी, पर न जाने क्यों नानी की तंज़ भरी आवाज़ में कही बातें मेरे भीतर तीर समान चुभ जातीं. अमीरी गरीबी की दीवार नाज़ुक नहीं, ईंटों से भी ज्यादा मज़बूत होती है. लाराकाणे में ज़मीनदारी थी, बड़ी हवेली थी, बग्गी थी, चार चार दासियां दिन रात उनके आगे पीछे फिरा करतीं. एक दिन भर घर की सफाई करती,  बिस्तर बिछाती, कपड़े धोती,  उन्हें सुखाकर इस्त्री करके रख देती. दूसरी चाय पानी नाश्ता, दो समय के खाने का पूरी व्यवस्था करती. तीसरी घर की ज़रुरतों के हर चीज़ को बाज़ार से ले आती और समूचे घर की देखभाल करती. और चौथी यह ‘कमली’ जो दस साल की उम्र से नानी की सेवा में लगी हुई है- नानी की हर आवाज़ पर हाज़िर हो जाती, फिर चाहे किसी भी समय, किसी भी चीज़ की मांग हो.
‘अरे मेरी चप्पल तो ले आना, देख मैंने कंघी कहां रख दी?, अरे चश्मा ज़रा साफ कर दे, एक कप चाय बनाकर पिला..! इस तरह के छोटे-मोटे काम कमली की जिम्मेवारी थी. लगभग मेरी उम्र की, पर सिंध में भी मैं स्कूल जाती और वह नानी की चाकरी में व्यस्त रहती. सबसे बड़ा काम था नानी का हुक्का जो दिन में दो-तीन बार भरकर नानी के सामने रखना.  यह लत घर में नानी के सिवाय किसी और को न थी. नानू बीड़ी पीते थे, और मेरे पिताजी शराब….! बाकी सब साफ़ सुथरी ज़िंदगी व्यतीत करने में प्रयासरत रहते.
         आखिर मौसम बदला. बहारों में खिज़ां आने के आसार बढ़ने  लगे. हलचल बढ़ी, दंगे हुए, मारपीट हुई, जुल्म अत्याचार की तपिश नानू को लपेट ले, इससे पहले नानू अपनी इज्जत बचाने के लिए समस्त परिवार को किसी मुसलमान दोस्त की मदद से पोरबंदर की ओर रवाना करने में जुट गए. हिंदुस्तान में भी उनके रहने खाने-पीने का इंतजाम कर दिया. नानू-नानी आए, और साथ मेरे पिता, मैं और कमली भी आई. मेरी मां के लिए नानी कहती है-’ तेरी वजह से तेरी मां को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा. न तुम पैदा होती, न वो मरती. हाय हाय मेरी मूमल रानी’  कहकर छाती पीटते हुए वह अपने बेटी का मातम मनाती थी.
         कमसिन को अपने साथ सिंध से स्थानांतरण के समय नानी ने उसकी पहचान देते कहा था- ‘यह मेरी नातिन है कमली. दो साल की हुई मां मर गई. अब मैं ही इसकी मां भी हूँ और नानी भी.’ कहते हुए दुपट्टे से आंखें पोछते नानी कमली का हाथ पकड़ते हुए, लाठी की ठक ठक के साथ, गाड़ी के इंतजार में खड़ी भीड़ के बीचो-बीच लापरवाही से अपना रास्ता बना लेती. यह हुनर कोई नानी से सीखें. पराए को अपना करना, और अपने को पराया करना.
मैं सोचती रही, मां मुझे जन्म देकर मर गई. कमली तो वहां की मुसलमान यतीम थी जिसने नाना की पनाह पाकर नानी की सेवादारी के लिए घर में अपनी जगह बना ली. मेरी मां तो उसकी एक ही बेटी थी जो मुझे जन्म देकर इस जहाँ से चली गई. यह कौन सी बेटी हुई जो कमली उनकी नातिन बन गई. सोचती रही, पर किसी सवाल का माकूल जवाब पाने में नाकाम रही.
खैर, सिंध छोड़कर हिन्द में आ बसे. घर बसा, दुकानदारी शुरू हुई और मेरी फिर से स्कूल में दाखिला हो गई. कमली को घर के काम की, नानी की सेवा की संपूर्ण जवाबदारी उठानी पड़ी. अपनी सेवाएं देते देते वह वक्त और माहौल के मुताबिक कभी कमली, तो कभी कमसिन बन जाती, कभी हिंदू तो कभी मुसलमान! वक़्त के चेहरे भी नकाब बदलते हैं. और अचानक एक दिन मेरे बाबा भी हार्ट अटैक में ग्रस्त होकर चल बसे. नानू इन्तहा तन्हा हो गए. हुई तो नानी भी, पर अपनी आवाज़ में खलिश भरकर बात करने में वह बहुत कुछ छुपा लिया करतीं.
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पटसन की खाट पर लेटी नानी की टांगों पर कमली के हाथ देर तक चलते रहे, कभी ऊपर की ओर, कभी नीचे की ओर घूमते हुए देह को सुकून देते रहे. नानी का मन जाने क्यों आज बिना मां बाप की बच्ची के लिए दुखी होने लगा. अपनी बेटी के साथ साथ उसकी मां नगीना भी याद आ गई जो उनके घर में पनाह लेकर, अंत तक निभा गई. भगवान के रहस्य में कब कौन झाँक पाया है. दोनों हमजोली, हम उम्र, अपनी अपनी बेटियों को अमानत के तौर उसकी गोद में छोड़ गईं ... और पल भी नहीं लगा सोचने में कि नानी ने उनको आगोश में भरकर गले लगा लिया.  पर बुरा हो इस विभाजन का जिसने धरती के साथ दिलों के भी टुकड़े टुकड़े कर दिए. हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के बैरी बन गए. सच तो यह है कि नानी का मन भी यहां और वहां की यादों के बीच में झूलता रहा.
नानी के अपने रिश्तेदार, भाई, बहन ने इस दरबदर होने के दौर में बंट गए. कुछ यहां आए, कुछ वहीं रह गए. ममता की छाती पर दरारें पड़ गईं. बस एक अपनी नातिन और एक न अपनी, न पराई नगीना की बेटी कमसिन,  उन्हें संभालते संभालते अब नानी थक गई थी. उसने भी बहुत कुछ खोया था, बाकी रिश्तो की माला में बचे थे चार मोती, नानू, नानी मैं और कमली.
नानी सोच की गलियों से होती हुई अपनी पटसन वाली खाट पर लेटी लेटी, कमली की हाथों के दबाव् का आनंद लेती रही.
‘नानी, गर्मी लगती हो तो पंखा झुलाऊं.  गरम हवा भी तो बहुत है.’ –मासूम बच्ची के स्नेह भरे आवाज़ में न जाने क्या था कि नानी का ह्रदय करुणा से भर गया. अपनी टांग खींचते हुए, खाट पर उठ बैठी और प्यार से कमली के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा-’ कमली अब तू भी देवकी के कमरे में जाकर आराम कर. सारा दिन काम करती रहती है. मेरी बातों को दिल से न लगाया कर. बूढ़ी हो गई हूँ, बड़बड़ की बीमारी हो गई है. आज से तू कमसिन नहीं, बस कमली है, मेरी कमली !’
‘नानी ....!’ कहकर वह कमली नानी की ममतामई गोद में समा गई.
‘कल ही तेरे नानू से कहकर देवकी के स्कूल में तेरा भी दाखिला करवाती हूँ. तू भी उसके साथ रहकर पढ़-लिख लेना.’
और दादी  की आंख से दो मोती लुढ़ककर छलके. एक देवकी के लिए, एक कमली के लिए!
6 अगस्त 2016
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 देवी नागरानी 
जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व् मीर अली मीर पुरूस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व् महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरुसकृत। सिन्धी से हिंदी अनुदित कहानियों को सुनें @ https://nangranidevi.blogspot.com/                              contact: dnangrani@gmail.com

सोमवार, 15 जुलाई 2024

लता तेजेश्वर 'रेणुका' जी की 5 कविताएँ



जीवनवृत
नाम- श्रीमती लता तेजेश्वर 'रेणुका', हिन्दीत्तर भाषी हिंदी लेखिका।
शिक्षा : ओड़िआ व अंग्रेजी, हिंदी, मातृभाषा: तेलुगु,
पिता, माता का नाम: गो. शाम्भूमुर्ती आचारी, गो. लक्ष्मीबाई आचारी
पति का नाम – को. तेजेश्वररॉव,  पुत्र, पुत्री के नाम - श्रावण एबं मेघा
जन्म तिथी - 28.03.68,  जन्म स्थान--- परलाखेमुंडी, ओडिशा, निवास स्थान - नवी मुंबई, महाराष्ट्र, 
शौक्षिक-- योग्यता- डिग्री, 
लेखन की विधाएँ- कविता, गज़ल, शेरो-शायरी, यात्रा संस्मरण, संस्मरण, लघू कथा, कहानी, उपन्यास, हाइकू, मुक्तक, किताबों की समीक्षा
 विशेष कार्य:
1.लेखन :  2007 से लेखन में लिप्त उससे पहले बचपन में लिखती थी पर प्रकाशित नहीं हो पाई थी, लेखन के अलावा फोटोग्राफी, गार्डनिंग, साहित्य व समाज सेवा, पाक कला, आदि में रुचि
2.संस्थापक और अध्यक्ष: 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' 2018 में संस्था का स्थापना, संस्था के द्वारा हिंदी और मातृभाषाओं के उत्थान के लिए  कार्यरत।
3. साहित्य-संकल्प नाम से यूट्यूब और ब्लॉग का एडमिन, जिसमें खुदके और संस्था के लिखकों के द्वारा काव्यपाठ, रचनाओं का पाठ , समीक्षा, साक्षात्कार आदि प्रसारित,
4. ऑनलाइन ऑफलाइन काव्यसम्मेलन, वार्षिकोत्सव आयोजन, प्रमाणपत्र और सम्मान वितरण
5. संपादन कार्य: 3किताबों का सम्पादन
1.सीप के मोती, इंडियानेट द्वारा प्रकाशित जिसमें 25 लेखक लेखिकाओं की सहभागिता रही
2. गुलिस्ताँ : 21 भाषाओं में उन्हीं भाषाओं के लिपी के साथ 23 रचनाकारों की रचनाओं को लेकर ईबुक प्रकाशित 
3.मैं भी सैनिक: 23 लिखकों की भागीदारी
मेरी रचनाएँ संकलित : 
1.अंतराष्ट्रीय उपन्यास खट्टी मीठी रिश्ते में लेखन सहभागिता, 
2. भारत की प्रतिभाशाली लेखिकाएँ में परिचय सहित दो कविताएँ, 
3.अन्तरास्ट्रीय संकलन 'पोएटेस विथ वॉइसेस स्ट्रांग' में एक हिंदी कविता परिचय सहित,
 4.'मुम्बई की हिंदी कवयित्रियाँ' में संक्षिप्त जीवन परिचय सहित कविता प्रकाशित और कई लघुकथाएँ ,आलेख, कविताएँ आदि अन्य कई पुस्तकों में और मेरे द्वारा संकलित पुस्तकों में रचनाएँ संगृहीत
6. प्रकाशित पुस्तकें -
1. मैं साक्षी यह धरती की (काव्य संग्रह)2009, second edition 2024, ई-बुक, pencil publication
2 हवेली(उपन्यासिका)2014, second edition - 2023 @ notionpress.com publication, पेपरबैक
3.'The Waves of Life' (अंग्रेजी)2015, notion press -ईबुक, पेपरबैक, ईबुक on amazon, notion press
4. चाँदनी रात में तुम (काव्य संग्रह). ई-बुक, पेपरबैक 2016 में प्रकाशित
5.सैलाब (लघुउपन्यास,2018) second edition -2024, Lions publication, amazon
6. भावनाएँ महकती हैं, 2019, indianet.com, दिल्ली
7. सुनो हे भागीरथी, 2020, indianet.com, दिल्ली
8.लहराता चाँद, उपन्यास, 2021, indianet.com, दिल्ली, 
9.चंद फ़ुहारें, क्षणिका संग्रह , 2023, indianet.com, दिल्ली
10. जिजीविषा, 2 उपन्यासिकाओं का संग्रह, 2024, किताबघर प्रकाशन, सुरभि series, 
11. इसके अलावा 3किताबें जीवन संस्मरण, लघुकथा संग्रह और कहनी संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार है। in process -2024
7. अन्य: अपनी मातृभाषा ओड़िया एबं तेलुगु में सृजन और काव्यपाठ। मातृभाषा ओड़िआ, तेलुगु में कहानी, कविता आदि लेखन जारी। कई मंचों पर हिंदी व मातृभाषाओं में मंचन, भारतीय बहुभाषी काव्यपाठ के मंचों पर मातृभाषा का प्रतिनिधत्व करते काव्यपाठ। बिभिन्न संस्थाओं के करीब 80मंचों पर हिंदी में काव्य एबं लघुकथा पाठ।
12. प्रशारित: 1..यू ट्यूब - विसुअल पोएट्री, मॉम.. ऍम आई अलाइव, + 2. daily motions: That dark night and school days. डिजिटल वॉइस वर्ल्ड के द्वारा कविताएँ यूट्यूब पर प्रसारित, साहित्य संकल्प नाम से यूट्यूब 2014 से कार्यरत, ब्लॉग लेखन आदि
8.अंतर्जाल पोर्टल पर : लिटरेचर इंडिया साइट, मातृभारती, प्रतिलिपि.कॉम, फणीश्वरनाथ रेणु साइट, इंस्टाग्राम, yourquote.com, ट्विटर,  स्वर्ण विभा, माझी मेट्रो, poemhunters.com, news zamania.in, litagram, जनकृति अंतराष्ट्रीय पत्रिका, storymirror.com,  2 fb accounts aur 6pages का संचालन, पॉर्टल पर अंग्रेजी, हिंदी, तेलुगु, एबं ओड़िया 4भाषाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, आदि प्रकाशित, कई व्ट्सप ग्रुप में लेखन।
9. पत्र, पत्रिकाओं में प्रकाशित: 1000 से ज्यादा आलेख, यात्रा संस्मरण, कविता व कहानियाँ आदि प्रतिष्ठित मॉगाजिनों, अखबारों, इ-मॉगाजिन, ब्लॉग्स एबं किताबों में हिंदी, अँग्रेजी में कविता कहानियाँ प्रकाशित
A) निम्न पत्रिकाओं में प्रकाशित: गर्भनाल, सहित्य सृजन, रिलायंस त्रै मासिक पत्रिका(जामनगर), सत्य दर्शन, साहित्य दर्शन, काव्य रंगोली, साहित्य समीर दस्तक, कवि मन, स्पंदन ( रिलायंस पत्रिका, पाताल गंगा, महाराष्ट्र से), मीडिया ट्रायल, दृष्टिपात, नई पीढ़ी, समाज कल्याण, राष्ट्र समर्पण, नेपथ्य, पुष्पगंधा, साहित्य समाचार, अदबी उड़ान राष्ट्रीय पत्रिका, संगिनी, कनाडा से प्रकाशित प्रयास, छत्तीसगढ़ के 11वीं विश्वहिंदी सम्मेलन के स्मारिका में भी कविताएँ प्रकाशित चलती रहती है।
B) अखबारों में प्रकाशित: लोकजंग, ट्रू मीडिया, मुंबई के नव भारत टाइम्स, नवभारत अखबार में कई आलेख, रचनाएँ प्रकशित।
C) आकशवाणी और राजस्थान रेडियो, डिजिटल वॉइस में भी रचनाएं प्रसारित और प्रकाशित।
प्रमुख सम्मान प्राप्त: 1.काव्यसंग्रह "में साक्षी यह धरती की" के लिए 'साहित्य गरिमा सम्मान', विश्वमैत्री मंच, 2. उपन्यास 'हवेली' के लिए 'समीर दस्तक राष्ट्रीय गौरव सम्मान', 3. अदबी उड़ान राष्ट्रीय हिंदी साहित्यकार सम्मान व पुरस्कार, 4. नारी गौरव सम्मान, (jmd प्रकाशन), 5.बहु भाषी लेखिका सम्मान, तेलुगु कला वेदिका, नवीमुम्बई, 6.हिंदी भाषा भूषण सम्मान, (साहित्य मंडल परिवार, नाथद्वारा) 7.हिंदी साहित्य भूषण सम्मान, काव्यरंगोली पत्रिका की ओर से, 8. शतकवीर सम्मान, (समगस व्ट्सप ग्रुप के द्वारा) 9.महाराजा श्री कृष्णचन्द्र जैन सम्मान, (समग्र साहित्यिक सेवा के लिए सम्मानित,शिलांग), 10. 4थ सोशल मीडिया प्रतिभा सम्मान, (दिल्ली से), 11. प्रतिभा सम्मान(समगस मंच), 12.'अग्निशिखा गौरव रत्न सम्मान' से सम्मानित (अग्निशिखा मंच),13. महादेवी वर्मा सम्मान, मॉरीशस में छत्तीसगढ़ से साहित्य सम्मान, और भी कुल 16 सम्मानों से सम्मानित।
ब्लॉग का लिंक https://latatejeswar.blogspot.in/?m=1
यूट्यूब का लिंक
https://youtube.com/@sahitya_sankalpa?si=VaQFciI6BmPROL-n
यात्राएँ और सामाजिक कार्य: राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय (भूटान, मॉरीशस) के सम्मेलनों में मंचन, आंध्रप्रदेश में सम्मानित, गुजरात महाराष्ट्र, चेन्नई, राजस्थान, मध्यप्रदेश, भोपाल आदि में साहित्य सम्मेलनों में भागीदारी व कई राज्यों में साहित्य व अन्य कार्यों के लिये यात्राएँ। 11वीं विश्वहिंदी सम्मेलन मॉरीशस में सहभागिता
Mob.no.- 9004762999, 
Mail Id- renuka_2803@yahoo.com
[24/06, 09:56] मंजुला पांडेय: आक्रोश


अँधेरा चीर कर सूरज निकला
शरीर से उसके खून के बूँदें टपक रहे थे।
कुछ बुँदे धरती पर छिड़क गयी
धरती की ऑंखें आंसू से भर आई।
दिल चीर कर चीख निकाला
बिलख बिलख कर रोने लगी।
हवा रुक गयी, बादल थम गए
पेड़ पत्ते हिलने से इनकार कर दिया,
सागर लहराना भूल गया,
पक्षियों ने उड़ना छोड़ दिया।
पर मानव को एहसास तक नहीं हुआ,
अपने देश में ख़ून ख़राबा चलता रहा,
अत्याचार बलात्कार सहता रहा
अन्याय के आगे सिर झुका दिया,
पेड़ पौधे काटता रहा
अपनी बर्बादी पर आप दस्तखत करता रहा।
धरती माँ रो रही है, 
बच्चों का भविष्य को देख रही है
मैया यशोदा की तरह दंडित करती
तो क्या मानव को अहसास होता?
सहने की भी हद होती है, माँ भी अब बेबस है
सब्र का बाँध टूट गया, वायु में जहर फैलने लगा
नदी ने रास्ता बदल दिया, रेगिस्तान में बाढ़ आई 
गाँव, शहर पानी से भर गए।
ये कैसा युग आया ?
सागर में प्रबाल हुए, ग्रीष्म ने अनल बरसाए -
ठंडी ने कोहरा फैलाया।
बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी ये बर्बादी
न जाने कहाँ होगा इसका अंत
ये तो मानव है, प्रकृति की नज़ाकत को समझे
माँ की मूलतत्व की कद्र करे।
आगे बढ़े, जरूर बढ़े, प्रकृति का नाश न करे
जगत का कल्याण करे व सच्चाई की रक्षा करे।
यही कुर्बानी धरती माँ के लिए 
कपूर होगा, आरती होगी
यही कुर्बानी दिया बनकर 
हम सब को रास्ता दिखाएगी।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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2. मौत से पहले
मौत से आँखें मिला कर चलने से पहले
इतना तो बन जाऊँ क़ाबिल--
मौत भी मुझे मार न सके 
जिन्दा रहूँ मैं, सबके दिल में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
पाप पुण्य के मेले में न रह जाऊँ किसी कोने में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
जो अन्याय को पहचान कर 
चुपचाप सह लेती है,
उफ़ तक नहीं करती, क्या यही जिंदगी है ?
मौत भी हमें प्यार से गोद में भर लेती है
ऐसी जिंदगी किस काम की 
जो मौत से पहले मार देती है ?
अन्याय अत्याचार तब होता है
जब आप सहते हो दोस्तो!
अन्याय बलात्कार तब होता है
जब आप ना लड़ते हो दोस्तो!
खुदको खड़ा कर सामना करो
उसका, जो आप को रास्ता दिखाने 
से पहले छीन लेता है,
जिंदगी सड़ने का नाम नहीं लड़ने है नाम
मौत से डरने से क्या होता है? जिंदगी से लड़ो।

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3.शहर
शाम और शहर, नगर और नार
यह शहर एक बेनामी अंधकार,
इसकी गलियाँ शराब की भट्टियाँ
यहाँ के लोग जैसे चलती फिरती लाशें।
इस शहर में भट्टियाँ जब जब जलती हैं
तब तब एक गुनाह पैदा होता है।
यह गुनाह की उम्र है कितनी...?

जब जब यह गुनाह की उम्र बढ़ती है,
साथ ही साथ कई गुनाह पैदा होते,
एक गुनाह का परिवार।
यह गुनाह जब जब एक लाश को जलाता
एक दुर्गंध इस वायु को विषाक्त कर देती
और इसकी हड्डियाँ वह गुनाह की भट्टि को 
और भी आग देती।
जब हड्डियाँ फ़टने लगती
वह आवाज़- गुनाह को 
और भी उत्साह देती
और गुनाह ख़ुशी से उछलते कूदते।
यह गुनाह की उम्र है कितनी ?

इस शहर में जब जब नल खोलते,
पानी नहीं खून की नदियाँ है बहती
इस शहर की नालियों में
गंदगी के साथ साथ गुनाह भी पलता।
यह रास्ते गुजरते लोगों की 
मासूमियत छीनकर
एक रक्त माँस की बू छोड़ जाती -
जिससे एक सैलाब पैदा होता है
और रोज़ कई लाशें गुनाह के
इस दल दल में फंसती जाती।
यह है शहर,  
जहाँ लोग नहीं गुनाह रहा करते हैं -
जहाँ लोग, लोग बन कर नहीं
लाश बन कर जिया करते हैं।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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4 निर्झर 

झर झर कंपमान है निर्झर तू, 
द्रुतगामी मेघ से भी द्रुततर,
न कोई स्थान, काल, चराचर 
न मानती कोई विघ्न, विलाप हलाहल। 
ना पर्वत या कोई धरोहर 
पुनः पुनः टकराती हुई पाषाण से,
असीम चुंबी प्रांत से निकल कर 
न मानी कभी व्यथा, चिंतन, विराग 
ऋषि, मुनि और गुणियों समान। 
सकल चराचर की अमृत धरा है तू,
मराल मृदु दोर्लित मंदगामी तू कहीं,
शीतल जल प्रवाह कटितट को जब टकराए 
बूँद  बूँद  जल राशि बिखरते 
विचलित मन की प्यास बुझाए। 
नारिंगना जैसी सर्पिल चाल, लचकाए, बलखाए-
नाट्य प्रावीण्य से भरपूर तब अंग 
वन मध्ये नाचे हिरन जैसे 
निर्झर झरती अविराम तू वैसे। 
उग्र शिवजी के मस्तक से तू निकली 
कभी प्रखर कभी सौजन्य भी 
कभी प्रलय रौद्र और प्रचंड भी 
कहीं शांत निम्नगा और प्रसन्न भी। 

क्रोधित नागिन जैसी तू उछल कर 
लांघती हुई सारी दीवार 
तांडव करती उग्र शिव की तरह-
नित्य निठुर और निर्मम तू 
निमेष मात्र, निरंकृत कर देती नगर नार। 

कैसे वर्णन करे तेरी काया ?
तेरा अस्तित्व ही है जग का साया। 


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5. मक़सद

उम्र हमारी बहुत बीतीं, 
दिन हमने बहुत गिने
रोज़, कैलेंडर के 
एक पन्ने को फाड़कर 
दिन की शुरुवात किया है।
एक पन्ने को फाड़कर हमने, 
उम्र का एक दिन जिया है,
हर एक पल का हिसाब लेने, 
आज जिंदगी से सवाल किया है।
रात बीती और दिन ढला, 
क्या दिया और क्या जिया है,
न मिला हमें कोई जवाब, 
क्या जिंदगी हम से रूठी है?
जी रहे और जीते रहे, 
हम एक बोझ है धरती के,
बीत गई है आधी उम्र, 
आज भी वहीं खड़े पाए हैं।
छोड़ दिए कुछ रास्ते में- 
बचपन की वह एहसास
आज बच्चों में ढूँढ़ रहे हैं, 
गुजरे पल का एक साँस।

बाक़ी जिंदगी का क्या है मक़सद, 
यह भी अनजान है,
आज तक हम समझ न पाए, 
जी रहे हैं तो क्यों हैं।

लता तेजेश्वर 'रेणुका'


मृदुला मिश्रा जी की समीक्षा कविताओं पर
आज पटल पर लता तेजेश्वर जी द्वारा रचित कविताएं लगी हैं। पहली कविता में कवियत्री ने अपनी चिंताओं को जाहिर किया है। संसार और मानव की गतिविधियों को देखकर उनका उद्वेलित मन चित्कार कर उठा है। बहुत खूब।

दूसरी कविता में अन्याय के प्रति लड़ने की प्रेरणा मिलती है इस कविता से। अत्याचार के प्रति जागरूक होना ही होगा।

तीसरी कविता में,शहर में रहने से कितने गुनाह होते हैं, कितनी समस्याएं झेलनी पड़ती है। अंतहीन पीड़ा जैसे जड़ जमाकर बैठ गई हो।
बहुत सुंदर।

चौथी कविता निर्झर को लेकर रची गई है। सुंदर बिम्ब से सजी है यह कविता।

पांचवीं कविता में जीने का मकसद क्या है। क्यों जी रहे हैं हम। यही प्रश्न ‌ लता जी ने उठाया है।
सभी कविताएं बेहद भाव भरी हैं।बिम्बों को भी कविता के अनुरूप ही सजाया गया है।
सुन्दर कविताओं के लिए लता जी को हार्दिक बधाई।और कुशल संचालन के लिए डॉ मंजू पांडेय जी को धन्यवाद।
मृदुला मिश्रा।
***********(
मीना गुप्ता जी का विचार
लता दीदी की रचनाएं पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हम जीवन दर्शन के नजदीक हैं.। उनकी रचनाओं में जहां शहरों का वर्णन है तो वही प्रकृति का भी वर्णन है। मौत और जिंदगी के रूप में अन्याय को न सहन करना यह भी उनकी रचनाओं में हम  सिखाते हैं । एक लेखिका के साथ-साथ एक अच्छी कवियत्री का हम सम्मान करते हैं।
 मीना गुप्ता


शिल्पा सोनटक्के जी का विचार

मृदुला जी, आपने बिलकुल सही कहा , लता जी की संवेदनशीलता  उनकी कविताओं में भी झलकती है. उनकी कविताओं में सामाजिक सरोकार भी है, अन्याय के प्रति आक्रोश भी है, शहर की तकलीफों का वर्णन भी है, प्रकृति की सुंदरता को भी उन्होंने बखूबी प्रस्तुत किया है ,और जीवन दर्शन को भी उन्होंने सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है.
कुल मिलाकर सभी कविताएं भावपूर्ण और सुंदर बन पड़ी हैं. जिसके लिए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं. मंजुला जी को धन्यवाद .
शिल्पा
**********

लता तेजेश्वर रेणुका जी का जीवन परिचय काफी प्रभावशाली है। बहुभाषाविदुषी तो आप हैं,साथ ही हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आपने अपना अदम्य स्थान बनाया है। अहिंदी भाषी होकर भी हिंदी में आपके द्वारा लिखे गए  उपन्यास, कहानियाँ, संस्मरण, लघुकथा, कविता, गीत सभी में शिल्प, शैली, एवं शब्दों का चयन करते समय बखूबी ध्यान दिया है। 
आपकी कविता  प्रकृति- प्रेम  सौंदर्य तो दर्शाती है साथ ही सकारात्मक उम्मीद और हौसला देती हुई सामाजिक जीवन दर्शन का बोध कराती है।
आपका संवेदनशील व्यक्तित्व साहित्य की सभी विधा में निखार लाता हुआ साहित्य  संचालिका की भूमिका भी शालीनता से निर्वहन कर रहा है। 

मेरी कोशिश करूंगी पटल पर आती रहूं। बाकी आप सबकी रचना का स्वाद लेती रहूंगी😊🫠

रविवार, 16 जून 2024

विश्वम्भर दयाल तिवारी जी की 5 कविताएँ




प्रस्तुत कविताएँ
1. *आखेट*

मत करो आखेट उनका
जो तुम्हारे पास हैं ।
जंगलों में अब नहीं 
कोई पखेरू खास हैं ।
मित्र पंछी नहीं मिलते 
खोजने पर आजकल ।
कष्ट देता है प्रदूषण 
छीनता सुख शान्ति पल ।

शोध वैज्ञानिक बताते 
विष-कणों को छानकर ।
व्याधि-तृष्णा-आपदा      
संकट समस्या जानकर ।

स्वच्छ पर्यावरण के 
सबको पता हों फायदे ।
करो पालन सदा ही 
जो भी सुरक्षा कायदे ।

रोक दो बढ़ता प्रदूषण 
वृक्षारोपण  करो जम ।
शुद्धता व स्वच्छता पर 
नजर रखो हर कदम  ।
 
2. *धारा* 

कंकड़ जिसके चुभे नहीं 
कभी पाँवों में ।
वो क्या समझे दर्द दूसरों
के पाँवों में ?
धोये चरण बैठ श्रमिकों के
वही कभी भी,
कंकड़ जिसके चुभे कहीं 
कभी पाँवों में ।

अच्छा-बुरा कहे चाहे कोई
सुबरन तो सुबरन रहता ।
कीमत भाव बदलते रहते 
जग जीवन वर्णन करता ।
कान्ति कर्महित नहीं हों धूमिल 
देखो नैन उघार के,
कपटी झूठा धूर्त चपल चित
खोखला आकर्षण करता ।

धर्म सनातन संस्कृति धारा
प्रेम भाव लेकर बहती ।
आदर सब धर्मों का करके
नीति-रीति मर्यादा कहती ।
पूजनीय चर-अचर सभी हैं 
कण-कण में रहते ईश्वर,
धर्म सनातन संस्कृति धारा
सुहृद भाव संग रह बहती ।

3.*संवेदना*
 
अनल अनिल नभ नीर भू
पालक प्रकृति सुवास ।
सुमन लता वन वृक्ष फल
साधक भरि उल्लास ।।

राम नाम जे जन उर धरहीं ।
तिन मन सुख सन्तोष संवरहीं ।।
विषय परिस्थिति परिचित प्रज्ञा ।
कोमल चित कुल स्वार्थ अवज्ञा ।।
देह गेह अरि मित्र समाना ।
भल अनभल कर्तव्य गुमाना ।।
बाल सुलभ मन जो करि राखा ।
पुलकित भाव उमंग सो पाखा ।।
होहिं मुदित मुनि सुर नर नारी ।
जब अनुकूल प्राप्त दिन चारी ।।
फूलहिं फलहिं न बेत बिधाना ।
चहे बरसहिं घन अमृत माना ।।
जप तप व्रत सेवा सुखदाई ।
निर्मल निश्छल उर हित पाई ।।
सुख-दुःख लाभ-हानि मद कामा ।
जोग भोग परसहिं जन धामा ।।
हठधर्मी मद विजय पराजय । 
भ्रमित जीव बल बुद्धि न छाजय ।।
जहाँ सुमति तहाँ सुख पथ रेखा ।
कुमति कुभाव न सद्सुख लेखा ।।

खुशी होइ परसुख लखे
विजय प्रगति सुनि जाग ।
विश्व सराहे मनुज मति
प्रेम धर्म सुचि भाग ।।

4. *अब और तब*

ना वो हवाएँ रहीं  
ना वो फिजाएँ रहीं ।
ना वो महबूब रहे
ना वो अदाएँ रहीं ।

पीपल के पेड़ पर 
चढ़ने-चढ़ाने का 
दौर ही कुछ और था ।
गाँव के तालाब में
कुएँ की जगत पर 
बैठकर नहाने का
ठौर ही कुछ और था ।

ना वो दवाएँ रहीं
ना वो दुआएँ रहीं ।
ना वो साथी दिखे
ना वो सभाएँ रहीं ।

लपटू-डंडा खेलते थे
आम के बागों में कभी ।
उनके सूखे पत्तों की 
फिरकी बनाते थे तभी ।

ना वो बाग रहे ।
ना वो बागबाँ रहे ।
ना वो तालाब रहे
ना वो कुमुदिनी रहीं ।

अब और तब के
जीवन में फर्क  
दिखता कुछ और है ।
है तो बहुत कुछ 
लिखने को शेष   
पर लेखन से जुड़ी
यादों में 
आँख मारने का ठौर है ।

मालूम है परिवर्तन 
प्रकृति का नियम है ।
सच तो यही ईश्वरीय
कृति का अधिनियम है ।
 
ना वो पंडित रहे
ना वो शिखाएँ रहीं ।
ना वो वृक्ष रहे
ना वो विभाएँ रहीं ।

हाँ आज भी दुआएँ हैं
व्याधि-दर्द की दवाएँ हैं ।
संवेदनाओं को 
फूल व पत्थर भी  
बनना पड़ेगा किसी 
निर्णायक घड़ी में
क्योंकि सुख चैन 
का पलना चाहते
ललन व ललनाएँ हैं ।
 
5. *सावधान*
 
सावधान हो जाओ बुलबुलो,
चमन तुम्हारा उजड़ न जाये ।
पहचानो मधुवन माली को,
जो दे सुरक्षा चमन बचाये ।।

सींच रहा है जो नित उपवन,
खर-पतवार को ढूँढ़ निकाले ।
कलियों की भी करे सुरक्षा,
डाल उर्वरक पौध को पाले ।।

आँधी-तूफानों को रोकना,
माना उसके नहीं है वश में ।
फिर भी करता है प्रयास वह,
ना क्षति हो उपवन यश में ।।

माली है अभिमन्यु दिखे,
दुर्योधन जैसों से लड़ता ।
नेह भक्ति गुण धर्म कर्म से,
पथ पर आगे है बढ़ता ।।

सुमन देखते हैं माली को,
चमन सनातन इसे पहचाने ।
घाटी माटी हिन्द की महके,
विश्वबन्धु ही कहना जाने ।।

वीर शहीदों के उपवन को
भक्त हिन्द के सींच रहे ।
त्याग प्रेम बलिदान परिश्रम 
ध्यान जनों का खींच रहे ।।

विश्वम्भर दयाल तिवारी


पता
•••••
ए-302 , कृष्णा रेजीडेन्सी सीएचएस
खारघर , नवी मुम्बई 
410210 महाराष्ट्र
ईमेल : tewarivd@gmail.com
चलभाष : 7506778090.

*परिचय*
******
नाम-विश्वम्भर दयाल तिवारी
माता- स्मृतिशेष श्रीमती कमला तिवारी
पिता-स्मृतिशेष श्री लालजी प्रसाद तिवारी

जन्म-स्थान
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ग्राम-सुन्सी
पोस्ट-ओयल
जिला-लखीमपुर-खीरी 

शैक्षणिक योग्यता
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ए•एम•आई•ई (मैकेनिकल)
संप्रति-पूर्व वैज्ञानिक अधिकारी
अभिरुचि- पठन-लेखन   
एकल काव्य-संग्रह  : काव्यांकिता,रश्मि-ऋषिका,गरिमार्चना,उरोज्ज्वला,
कीर्तिप्रभा ,वन्दिता
एकल लघुकथा संग्रह  : छप्पर की छाँव
साझा काव्य-संग्रह
     ••••••••••••
* सहोदरी सोपान - 4, काव्य-करुणा, अरुणोदय
* शुभारम्भ , साहित्य समर्पण, उजेश, अग्निशिखा काव्यधारा, काव्य-धारा, दिवित

पत्रिकाओं में रचनाएँ    
     ••••••••••••••
* वैज्ञानिक, संस्कृति , ऊर्जायन, गतिमान,  अग्रिमान, कथाबिंब 

साझा लघुकथा संग्रह 
     •••••••••••••••
* शब्द लिखेंगे इतिहास