जीवनवृत
नाम- श्रीमती लता तेजेश्वर 'रेणुका', हिन्दीत्तर भाषी हिंदी लेखिका।
शिक्षा : ओड़िआ व अंग्रेजी, हिंदी, मातृभाषा: तेलुगु,
पिता, माता का नाम: गो. शाम्भूमुर्ती आचारी, गो. लक्ष्मीबाई आचारी
पति का नाम – को. तेजेश्वररॉव, पुत्र, पुत्री के नाम - श्रावण एबं मेघा
जन्म तिथी - 28.03.68, जन्म स्थान--- परलाखेमुंडी, ओडिशा, निवास स्थान - नवी मुंबई, महाराष्ट्र,
शौक्षिक-- योग्यता- डिग्री,
लेखन की विधाएँ- कविता, गज़ल, शेरो-शायरी, यात्रा संस्मरण, संस्मरण, लघू कथा, कहानी, उपन्यास, हाइकू, मुक्तक, किताबों की समीक्षा
विशेष कार्य:
1.लेखन : 2007 से लेखन में लिप्त उससे पहले बचपन में लिखती थी पर प्रकाशित नहीं हो पाई थी, लेखन के अलावा फोटोग्राफी, गार्डनिंग, साहित्य व समाज सेवा, पाक कला, आदि में रुचि
2.संस्थापक और अध्यक्ष: 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' 2018 में संस्था का स्थापना, संस्था के द्वारा हिंदी और मातृभाषाओं के उत्थान के लिए कार्यरत।
3. साहित्य-संकल्प नाम से यूट्यूब और ब्लॉग का एडमिन, जिसमें खुदके और संस्था के लिखकों के द्वारा काव्यपाठ, रचनाओं का पाठ , समीक्षा, साक्षात्कार आदि प्रसारित,
4. ऑनलाइन ऑफलाइन काव्यसम्मेलन, वार्षिकोत्सव आयोजन, प्रमाणपत्र और सम्मान वितरण
5. संपादन कार्य: 3किताबों का सम्पादन
1.सीप के मोती, इंडियानेट द्वारा प्रकाशित जिसमें 25 लेखक लेखिकाओं की सहभागिता रही
2. गुलिस्ताँ : 21 भाषाओं में उन्हीं भाषाओं के लिपी के साथ 23 रचनाकारों की रचनाओं को लेकर ईबुक प्रकाशित
3.मैं भी सैनिक: 23 लिखकों की भागीदारी
मेरी रचनाएँ संकलित :
1.अंतराष्ट्रीय उपन्यास खट्टी मीठी रिश्ते में लेखन सहभागिता,
2. भारत की प्रतिभाशाली लेखिकाएँ में परिचय सहित दो कविताएँ,
3.अन्तरास्ट्रीय संकलन 'पोएटेस विथ वॉइसेस स्ट्रांग' में एक हिंदी कविता परिचय सहित,
4.'मुम्बई की हिंदी कवयित्रियाँ' में संक्षिप्त जीवन परिचय सहित कविता प्रकाशित और कई लघुकथाएँ ,आलेख, कविताएँ आदि अन्य कई पुस्तकों में और मेरे द्वारा संकलित पुस्तकों में रचनाएँ संगृहीत
6. प्रकाशित पुस्तकें -
1. मैं साक्षी यह धरती की (काव्य संग्रह)2009, second edition 2024, ई-बुक, pencil publication
2 हवेली(उपन्यासिका)2014, second edition - 2023 @ notionpress.com publication, पेपरबैक
3.'The Waves of Life' (अंग्रेजी)2015, notion press -ईबुक, पेपरबैक, ईबुक on amazon, notion press
4. चाँदनी रात में तुम (काव्य संग्रह). ई-बुक, पेपरबैक 2016 में प्रकाशित
5.सैलाब (लघुउपन्यास,2018) second edition -2024, Lions publication, amazon
6. भावनाएँ महकती हैं, 2019, indianet.com, दिल्ली
7. सुनो हे भागीरथी, 2020, indianet.com, दिल्ली
8.लहराता चाँद, उपन्यास, 2021, indianet.com, दिल्ली,
9.चंद फ़ुहारें, क्षणिका संग्रह , 2023, indianet.com, दिल्ली
10. जिजीविषा, 2 उपन्यासिकाओं का संग्रह, 2024, किताबघर प्रकाशन, सुरभि series,
11. इसके अलावा 3किताबें जीवन संस्मरण, लघुकथा संग्रह और कहनी संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार है। in process -2024
7. अन्य: अपनी मातृभाषा ओड़िया एबं तेलुगु में सृजन और काव्यपाठ। मातृभाषा ओड़िआ, तेलुगु में कहानी, कविता आदि लेखन जारी। कई मंचों पर हिंदी व मातृभाषाओं में मंचन, भारतीय बहुभाषी काव्यपाठ के मंचों पर मातृभाषा का प्रतिनिधत्व करते काव्यपाठ। बिभिन्न संस्थाओं के करीब 80मंचों पर हिंदी में काव्य एबं लघुकथा पाठ।
12. प्रशारित: 1..यू ट्यूब - विसुअल पोएट्री, मॉम.. ऍम आई अलाइव, + 2. daily motions: That dark night and school days. डिजिटल वॉइस वर्ल्ड के द्वारा कविताएँ यूट्यूब पर प्रसारित, साहित्य संकल्प नाम से यूट्यूब 2014 से कार्यरत, ब्लॉग लेखन आदि
8.अंतर्जाल पोर्टल पर : लिटरेचर इंडिया साइट, मातृभारती, प्रतिलिपि.कॉम, फणीश्वरनाथ रेणु साइट, इंस्टाग्राम, yourquote.com, ट्विटर, स्वर्ण विभा, माझी मेट्रो, poemhunters.com, news zamania.in, litagram, जनकृति अंतराष्ट्रीय पत्रिका, storymirror.com, 2 fb accounts aur 6pages का संचालन, पॉर्टल पर अंग्रेजी, हिंदी, तेलुगु, एबं ओड़िया 4भाषाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, आदि प्रकाशित, कई व्ट्सप ग्रुप में लेखन।
9. पत्र, पत्रिकाओं में प्रकाशित: 1000 से ज्यादा आलेख, यात्रा संस्मरण, कविता व कहानियाँ आदि प्रतिष्ठित मॉगाजिनों, अखबारों, इ-मॉगाजिन, ब्लॉग्स एबं किताबों में हिंदी, अँग्रेजी में कविता कहानियाँ प्रकाशित
A) निम्न पत्रिकाओं में प्रकाशित: गर्भनाल, सहित्य सृजन, रिलायंस त्रै मासिक पत्रिका(जामनगर), सत्य दर्शन, साहित्य दर्शन, काव्य रंगोली, साहित्य समीर दस्तक, कवि मन, स्पंदन ( रिलायंस पत्रिका, पाताल गंगा, महाराष्ट्र से), मीडिया ट्रायल, दृष्टिपात, नई पीढ़ी, समाज कल्याण, राष्ट्र समर्पण, नेपथ्य, पुष्पगंधा, साहित्य समाचार, अदबी उड़ान राष्ट्रीय पत्रिका, संगिनी, कनाडा से प्रकाशित प्रयास, छत्तीसगढ़ के 11वीं विश्वहिंदी सम्मेलन के स्मारिका में भी कविताएँ प्रकाशित चलती रहती है।
B) अखबारों में प्रकाशित: लोकजंग, ट्रू मीडिया, मुंबई के नव भारत टाइम्स, नवभारत अखबार में कई आलेख, रचनाएँ प्रकशित।
C) आकशवाणी और राजस्थान रेडियो, डिजिटल वॉइस में भी रचनाएं प्रसारित और प्रकाशित।
प्रमुख सम्मान प्राप्त: 1.काव्यसंग्रह "में साक्षी यह धरती की" के लिए 'साहित्य गरिमा सम्मान', विश्वमैत्री मंच, 2. उपन्यास 'हवेली' के लिए 'समीर दस्तक राष्ट्रीय गौरव सम्मान', 3. अदबी उड़ान राष्ट्रीय हिंदी साहित्यकार सम्मान व पुरस्कार, 4. नारी गौरव सम्मान, (jmd प्रकाशन), 5.बहु भाषी लेखिका सम्मान, तेलुगु कला वेदिका, नवीमुम्बई, 6.हिंदी भाषा भूषण सम्मान, (साहित्य मंडल परिवार, नाथद्वारा) 7.हिंदी साहित्य भूषण सम्मान, काव्यरंगोली पत्रिका की ओर से, 8. शतकवीर सम्मान, (समगस व्ट्सप ग्रुप के द्वारा) 9.महाराजा श्री कृष्णचन्द्र जैन सम्मान, (समग्र साहित्यिक सेवा के लिए सम्मानित,शिलांग), 10. 4थ सोशल मीडिया प्रतिभा सम्मान, (दिल्ली से), 11. प्रतिभा सम्मान(समगस मंच), 12.'अग्निशिखा गौरव रत्न सम्मान' से सम्मानित (अग्निशिखा मंच),13. महादेवी वर्मा सम्मान, मॉरीशस में छत्तीसगढ़ से साहित्य सम्मान, और भी कुल 16 सम्मानों से सम्मानित।
ब्लॉग का लिंक https://latatejeswar.blogspot.in/?m=1
यूट्यूब का लिंक
https://youtube.com/@sahitya_sankalpa?si=VaQFciI6BmPROL-n
यात्राएँ और सामाजिक कार्य: राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय (भूटान, मॉरीशस) के सम्मेलनों में मंचन, आंध्रप्रदेश में सम्मानित, गुजरात महाराष्ट्र, चेन्नई, राजस्थान, मध्यप्रदेश, भोपाल आदि में साहित्य सम्मेलनों में भागीदारी व कई राज्यों में साहित्य व अन्य कार्यों के लिये यात्राएँ। 11वीं विश्वहिंदी सम्मेलन मॉरीशस में सहभागिता
Mob.no.- 9004762999,
Mail Id- renuka_2803@yahoo.com
[24/06, 09:56] मंजुला पांडेय: आक्रोश
अँधेरा चीर कर सूरज निकला
शरीर से उसके खून के बूँदें टपक रहे थे।
कुछ बुँदे धरती पर छिड़क गयी
धरती की ऑंखें आंसू से भर आई।
दिल चीर कर चीख निकाला
बिलख बिलख कर रोने लगी।
हवा रुक गयी, बादल थम गए
पेड़ पत्ते हिलने से इनकार कर दिया,
सागर लहराना भूल गया,
पक्षियों ने उड़ना छोड़ दिया।
पर मानव को एहसास तक नहीं हुआ,
अपने देश में ख़ून ख़राबा चलता रहा,
अत्याचार बलात्कार सहता रहा
अन्याय के आगे सिर झुका दिया,
पेड़ पौधे काटता रहा
अपनी बर्बादी पर आप दस्तखत करता रहा।
धरती माँ रो रही है,
बच्चों का भविष्य को देख रही है
मैया यशोदा की तरह दंडित करती
तो क्या मानव को अहसास होता?
सहने की भी हद होती है, माँ भी अब बेबस है
सब्र का बाँध टूट गया, वायु में जहर फैलने लगा
नदी ने रास्ता बदल दिया, रेगिस्तान में बाढ़ आई
गाँव, शहर पानी से भर गए।
ये कैसा युग आया ?
सागर में प्रबाल हुए, ग्रीष्म ने अनल बरसाए -
ठंडी ने कोहरा फैलाया।
बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी ये बर्बादी
न जाने कहाँ होगा इसका अंत
ये तो मानव है, प्रकृति की नज़ाकत को समझे
माँ की मूलतत्व की कद्र करे।
आगे बढ़े, जरूर बढ़े, प्रकृति का नाश न करे
जगत का कल्याण करे व सच्चाई की रक्षा करे।
यही कुर्बानी धरती माँ के लिए
कपूर होगा, आरती होगी
यही कुर्बानी दिया बनकर
हम सब को रास्ता दिखाएगी।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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2. मौत से पहले
मौत से आँखें मिला कर चलने से पहले
इतना तो बन जाऊँ क़ाबिल--
मौत भी मुझे मार न सके
जिन्दा रहूँ मैं, सबके दिल में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
पाप पुण्य के मेले में न रह जाऊँ किसी कोने में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
जो अन्याय को पहचान कर
चुपचाप सह लेती है,
उफ़ तक नहीं करती, क्या यही जिंदगी है ?
मौत भी हमें प्यार से गोद में भर लेती है
ऐसी जिंदगी किस काम की
जो मौत से पहले मार देती है ?
अन्याय अत्याचार तब होता है
जब आप सहते हो दोस्तो!
अन्याय बलात्कार तब होता है
जब आप ना लड़ते हो दोस्तो!
खुदको खड़ा कर सामना करो
उसका, जो आप को रास्ता दिखाने
से पहले छीन लेता है,
जिंदगी सड़ने का नाम नहीं लड़ने है नाम
मौत से डरने से क्या होता है? जिंदगी से लड़ो।
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3.शहर
शाम और शहर, नगर और नार
यह शहर एक बेनामी अंधकार,
इसकी गलियाँ शराब की भट्टियाँ
यहाँ के लोग जैसे चलती फिरती लाशें।
इस शहर में भट्टियाँ जब जब जलती हैं
तब तब एक गुनाह पैदा होता है।
यह गुनाह की उम्र है कितनी...?
जब जब यह गुनाह की उम्र बढ़ती है,
साथ ही साथ कई गुनाह पैदा होते,
एक गुनाह का परिवार।
यह गुनाह जब जब एक लाश को जलाता
एक दुर्गंध इस वायु को विषाक्त कर देती
और इसकी हड्डियाँ वह गुनाह की भट्टि को
और भी आग देती।
जब हड्डियाँ फ़टने लगती
वह आवाज़- गुनाह को
और भी उत्साह देती
और गुनाह ख़ुशी से उछलते कूदते।
यह गुनाह की उम्र है कितनी ?
इस शहर में जब जब नल खोलते,
पानी नहीं खून की नदियाँ है बहती
इस शहर की नालियों में
गंदगी के साथ साथ गुनाह भी पलता।
यह रास्ते गुजरते लोगों की
मासूमियत छीनकर
एक रक्त माँस की बू छोड़ जाती -
जिससे एक सैलाब पैदा होता है
और रोज़ कई लाशें गुनाह के
इस दल दल में फंसती जाती।
यह है शहर,
जहाँ लोग नहीं गुनाह रहा करते हैं -
जहाँ लोग, लोग बन कर नहीं
लाश बन कर जिया करते हैं।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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4 निर्झर
झर झर कंपमान है निर्झर तू,
द्रुतगामी मेघ से भी द्रुततर,
न कोई स्थान, काल, चराचर
न मानती कोई विघ्न, विलाप हलाहल।
ना पर्वत या कोई धरोहर
पुनः पुनः टकराती हुई पाषाण से,
असीम चुंबी प्रांत से निकल कर
न मानी कभी व्यथा, चिंतन, विराग
ऋषि, मुनि और गुणियों समान।
सकल चराचर की अमृत धरा है तू,
मराल मृदु दोर्लित मंदगामी तू कहीं,
शीतल जल प्रवाह कटितट को जब टकराए
बूँद बूँद जल राशि बिखरते
विचलित मन की प्यास बुझाए।
नारिंगना जैसी सर्पिल चाल, लचकाए, बलखाए-
नाट्य प्रावीण्य से भरपूर तब अंग
वन मध्ये नाचे हिरन जैसे
निर्झर झरती अविराम तू वैसे।
उग्र शिवजी के मस्तक से तू निकली
कभी प्रखर कभी सौजन्य भी
कभी प्रलय रौद्र और प्रचंड भी
कहीं शांत निम्नगा और प्रसन्न भी।
क्रोधित नागिन जैसी तू उछल कर
लांघती हुई सारी दीवार
तांडव करती उग्र शिव की तरह-
नित्य निठुर और निर्मम तू
निमेष मात्र, निरंकृत कर देती नगर नार।
कैसे वर्णन करे तेरी काया ?
तेरा अस्तित्व ही है जग का साया।
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5. मक़सद
उम्र हमारी बहुत बीतीं,
दिन हमने बहुत गिने
रोज़, कैलेंडर के
एक पन्ने को फाड़कर
दिन की शुरुवात किया है।
एक पन्ने को फाड़कर हमने,
उम्र का एक दिन जिया है,
हर एक पल का हिसाब लेने,
आज जिंदगी से सवाल किया है।
रात बीती और दिन ढला,
क्या दिया और क्या जिया है,
न मिला हमें कोई जवाब,
क्या जिंदगी हम से रूठी है?
जी रहे और जीते रहे,
हम एक बोझ है धरती के,
बीत गई है आधी उम्र,
आज भी वहीं खड़े पाए हैं।
छोड़ दिए कुछ रास्ते में-
बचपन की वह एहसास
आज बच्चों में ढूँढ़ रहे हैं,
गुजरे पल का एक साँस।
बाक़ी जिंदगी का क्या है मक़सद,
यह भी अनजान है,
आज तक हम समझ न पाए,
जी रहे हैं तो क्यों हैं।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'
मृदुला मिश्रा जी की समीक्षा कविताओं पर
आज पटल पर लता तेजेश्वर जी द्वारा रचित कविताएं लगी हैं। पहली कविता में कवियत्री ने अपनी चिंताओं को जाहिर किया है। संसार और मानव की गतिविधियों को देखकर उनका उद्वेलित मन चित्कार कर उठा है। बहुत खूब।
दूसरी कविता में अन्याय के प्रति लड़ने की प्रेरणा मिलती है इस कविता से। अत्याचार के प्रति जागरूक होना ही होगा।
तीसरी कविता में,शहर में रहने से कितने गुनाह होते हैं, कितनी समस्याएं झेलनी पड़ती है। अंतहीन पीड़ा जैसे जड़ जमाकर बैठ गई हो।
बहुत सुंदर।
चौथी कविता निर्झर को लेकर रची गई है। सुंदर बिम्ब से सजी है यह कविता।
पांचवीं कविता में जीने का मकसद क्या है। क्यों जी रहे हैं हम। यही प्रश्न लता जी ने उठाया है।
सभी कविताएं बेहद भाव भरी हैं।बिम्बों को भी कविता के अनुरूप ही सजाया गया है।
सुन्दर कविताओं के लिए लता जी को हार्दिक बधाई।और कुशल संचालन के लिए डॉ मंजू पांडेय जी को धन्यवाद।
मृदुला मिश्रा।
***********(
मीना गुप्ता जी का विचार
लता दीदी की रचनाएं पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हम जीवन दर्शन के नजदीक हैं.। उनकी रचनाओं में जहां शहरों का वर्णन है तो वही प्रकृति का भी वर्णन है। मौत और जिंदगी के रूप में अन्याय को न सहन करना यह भी उनकी रचनाओं में हम सिखाते हैं । एक लेखिका के साथ-साथ एक अच्छी कवियत्री का हम सम्मान करते हैं।
मीना गुप्ता
शिल्पा सोनटक्के जी का विचार
मृदुला जी, आपने बिलकुल सही कहा , लता जी की संवेदनशीलता उनकी कविताओं में भी झलकती है. उनकी कविताओं में सामाजिक सरोकार भी है, अन्याय के प्रति आक्रोश भी है, शहर की तकलीफों का वर्णन भी है, प्रकृति की सुंदरता को भी उन्होंने बखूबी प्रस्तुत किया है ,और जीवन दर्शन को भी उन्होंने सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है.
कुल मिलाकर सभी कविताएं भावपूर्ण और सुंदर बन पड़ी हैं. जिसके लिए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं. मंजुला जी को धन्यवाद .
शिल्पा
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लता तेजेश्वर रेणुका जी का जीवन परिचय काफी प्रभावशाली है। बहुभाषाविदुषी तो आप हैं,साथ ही हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आपने अपना अदम्य स्थान बनाया है। अहिंदी भाषी होकर भी हिंदी में आपके द्वारा लिखे गए उपन्यास, कहानियाँ, संस्मरण, लघुकथा, कविता, गीत सभी में शिल्प, शैली, एवं शब्दों का चयन करते समय बखूबी ध्यान दिया है।
आपकी कविता प्रकृति- प्रेम सौंदर्य तो दर्शाती है साथ ही सकारात्मक उम्मीद और हौसला देती हुई सामाजिक जीवन दर्शन का बोध कराती है।
आपका संवेदनशील व्यक्तित्व साहित्य की सभी विधा में निखार लाता हुआ साहित्य संचालिका की भूमिका भी शालीनता से निर्वहन कर रहा है।
मेरी कोशिश करूंगी पटल पर आती रहूं। बाकी आप सबकी रचना का स्वाद लेती रहूंगी😊🫠