विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम की ओर से आयोजित 4थ ऑनलाइन काव्यसम्मेलन:
14 नवम्बर 2018 को स्थापित 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' संस्था के द्वारा गूगलमीट पर 'नवीन पनवेल' से ऑनलाइन काव्यसम्मेलन मनाया गया। जिसमें अलग अलग प्रान्तों से 20 रचनाकार जुड़े। संस्था की अध्यक्षा श्रीमती लता तेजेश्वर रेणुका' संस्थापक आद तेजेश्वरराव जी ने नवीन पनवेल मुम्बई से कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्याध्यक्ष खारघर से लघुकथाकार आद सेवासदन प्रसादजी, मुख्यतिथि मूलतः पंजाब के आद अमरजीत कौंके जी, अपनी उपस्थिति दे कर मंच का शोभा बढ़ाया। संस्था अध्यक्षा लता तेजेश्वर रेणुका जी ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इन कुछ दिनों में कोरोना से हमसे बिछड़गए साहित्यकारों के लिए 2मिनट का मौन रखने के बाद कार्यक्रम में सभी विधाओं पर रचनाएँ प्रस्तुत की गई और 12 भाषाओं में रचनाएँ पढ़ी गई। लता तेजश्वर रेणुकाजी, पारमिता षडंगीजी, मंजूला पांडेयजी, रतनलाल मेनारियाजी, डाॅ० सरोजा मेटी लोडायजी, गायत्री खंडाटेजी, मधुश्री देशपांडे गानूजी, उषा साहूजी, साधना कृष्णजी, मैत्रेयी कमिला जी, प्रभा शर्मा जी, विश्वम्बर नाथ तिवारी जी, मीना गुप्ता, अमरजीत कौंकेजी, सेवा सदन प्रसादजी ने भी सुंदर कविताओं से मंच पर काव्यपाठ किया, मधुबाला कुशवाहजी, सुमिता केसवा जी, अनिता रविजी, चंद्रिका व्यासजी ने कार्यक्रम में उपस्थित रहकर रचनाओं का आनंद उठाया। सेवासदन प्रसादजी ने विस्तार से सभी बहुभाषी कवि कवयित्रियों को बधाई दी। और आद कौंकेजी ने प्रस्तुत रचनाओं पर व्यक्तव्य दिया। केेकार्यक्रम का संचालन आद पारमिता षडंगी ने किया और आद उषा साहू जी ने कार्यक्रम में उपस्थित रहकर कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभा का आभार प्रकट किया।
1।लता जी की कविता - चाँद और सूरज पर ग्रहण जो प्रकृति का चाल है उसे खूबसूरती से एक अलग ढंग से समझाया है वे कहती है,
सागर जब चाँद को देखा हँस हँस कर फूल गया
गुस्से से नाराज़ चाँद ने सूरज से दूर छुप गया
सागर जबजब चाँद को देखे हँसी समा न पाये
पेट उसका फूल फूल कर लहरें बड़ा बन जाए।
साथ ही एक तेलुगु कविता
तेलुगु - संगीतं ना पाटा कू
रेक्कलू इसतुन्दी -
अनुवाद : - संगीत मेरे गीत को
पंख देता है.
कविताएँ पढ़ीं।
2. लघुकथाकार सेवासदन प्रसाद जी की रचना
मुझे 'कोरोना ' से डर नहीं
पर टी वी से डरता रहता,
उलूल - जुलूल खबरें सुनने से
सदा परहेज करता रहता।
3.बस में गीत गाती लड़की - अमरजीत कौंके
बस में हाथ जोड़ कर खड़ी
एक छोटी सी लड़की
गीत गा रही है...
शोर-गुल से बेपरवाह
वह छोटी सी लड़की
अपनी ही धुन में
गीत गाए जा रही है...
लेकिन उसे अपने गीत पर
कितना भरोसा है...
4.मधुश्री देशपांडे गानू की रचनाएं -
१) मराठी कविता :
"माझी कविता"
एकटीने चालता वाट ही
शब्द सोबत असती
प्रियतमा ही मानिनी
सखी साजणी..
२) हिंदी कविता
एक पल के लिए भी
तुम क्यों नहीं छूटते मुझ से??
इन्हीं सवालों ने घेरा हैं.........
5.साधनाकृष्ण की रचना.....
समय की नब्ज को नापा कर।
तू अपने अंदर झाँका कर।। (हिंदी गीत)
हम गाँवें के सुथ्थर बनायेब
शहर घुमे कहियो न जायेब ( बज्जिका गीत)
6.पारमिता षड़गीं
"कविता लेखिबार अछि"
सेइ जोउ स्वर्ग टा
मोते पुरस्कार रे मिलिथिला
से त कोउ काम र नुहँ
आपणेइकि कि लाभ
आह:, जदि डुबि जाउथिबा सूर्य कु रोकि पारन्ति
ना अंधार हुअन्ता
ना झापसा देखा जाआन्ता...
शीर्षक"कविता लिखनी थी"
मत रोको मुझे, देखो
चिकना पत्थर भी शांत समुद्र में
पाँव धोने लगा है।
कविता लिखनी है अभी
नहीं तो रात खो जाएगी
आकाश की बाहों में, और
सुबह कहीं और
निकल जाएगी बेमतलब की
तर्क वितर्क में ।
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7. मैत्रेयी कमीला Od, नेरुल:
କାଳିଆ କେମିତି ଅଛୁ ବଡ଼ଦେଉଳ ରେ
ସବୁ ବୁଝି ଅବୁଝା
ସବୁ ଶୁଣି ନ ଶୁଣିଲା ପରି ଲାଗୁଛୁ
ତୁ ତ ଆକାରରୁ ନିରାକାର
ଅକ୍ଷର ରୁ ଓଁକାର
ତୋ ଚକା ଚକା ଆଖି ରେ କୁଆଡେ ଚନ୍ଦ୍ର ସୂର୍ଯ୍ୟ ର ତେଜ
आज फिर सूरज आया एक उमीद के किरण लिए
कल का अंधी तूफान के बाद हा हा कारमय जीवन
धराशायी पेड़ के नीचे जमीन
बादल से भरा आसमान
हरतरफ पानी पानी
खेत, जमीन, गांव
गांव का घर
गांव से सड़क के ओर कच्चा रस्ता
सब पानी से अस्तब्यस्त...
8.मंजुला पांडेय: भाल दिन जरूर आला..
(अच्छे दिन जरूर आएंगे) - कुमाउँनी
भाल दिन जरूर आला..
मिल जुल बेर सप्पै फिर यां रौला।
नांतीना है गई अब बेघर बेसहार।
बुढ़ बाढीजुवान ले है गईं उदास
भाल दिन जरूर आला.......
हिंदी:
निर्बाध गति से हो रहा था
निर्माण कंक्रीट के भवनों का भौतिकवाद की अंधी आंधी में
डूब रहे थे शहर व गांव भी
ऐसे में प्रकृति आई मां बनकर
लगाने को जबरदस्त थप्पड़...
9. मीना गुप्ता के शब्द :
आज बड़ी शिद्दत के बाद मैं सुकून पाई हूँ
दिल खोलकर मैं भी आज मुस्कुराई हूँ
पड़ोसन आज खिड़की खोल मुस्काई है
इस लॉक डॉउन में ज़िंदगी की आहट पाई है।
10. रतनलाल मेनारिया जी की कविता
मैं कविता क्या लिखूँ खुद कविता बन गया हूँ।
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मैं कविता क्या लिखूँ खुद कविता बन गया हूँ।
मैं राग दरबारी लिखू या , सच का आइना लिखू या झूँठ लिखू
मैं कविता क्या लिखूँ खुद कविता बन गया हूँ।