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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

नाम: मैत्रेयी कमीला


ଖୋଜୁଛି ମୁ ଏମିତି ଏକ ଋତୁ

ଖୋଜୁଛି ମୁଁ ଏମିତି ଏକ  ଋତୁ
ବଦଳିଯାଇଥିବ ଘାସ ଆଉ ଫୁଲର କାହାଣୀ
ପାହାଡ଼ଟା ଆଉ ଧୂସୁରା ଦିସୁନଥିବ 
ପାଣିର ଗାର ପରି ଲିଭୁଥିବ
ରାଗରୁଷ ମାନଭିମାନ 
ତର୍କବିତର୍କ ଠୁ ଦୁରେଇଥିବ ସମ୍ପର୍କ ର ଡୋର
ଅନ୍ଧବିଶ୍ୱାସ କୁ ସଂସ୍କାର ଗଣ୍ଠିଲି ମାରି ଉଇ ଖାଉଥିବ
ସମପ୍ରଦାୟିକତା ଭେଦଭୁଲି ବାଣ୍ଟୁଥିବା ନାରା "ଆମେ ସବୁ ଏକ"


ମୋତେ ଠିକ ସେ ହୁଳହୁଳି ପକେଇ ଆସେନି ,ଭଲ ରାନ୍ଧି ଆସେନି କହି ତୁମେ ବାଟ ଭାଙ୍ଗି ଚାଲିଯିବନି
ଆଖିକୁ ଦିସୁନି କହି ଶବ୍ଦ ସବୁ ଖାତାରେ ଏପାଖ ସେପାଖ ହେବେନି
ଏମିତି ଏକ ଋତୁ 
ସମୟ ଟା ଟିକେ ରହିଯିବ
ସୁନସାନ ଖରାବେଳେ
କୃଷ୍ନଚୁଡା ଛାଇତଳେ
ଫଗୁଣ ସରିନି କହି


ଅଙ୍କା ବଙ୍କା ରାସ୍ତା ସରି ଆସୁଥିବ
କେହି ନ ଝୁଣ୍ଟିଲା  ଭଳି
ବାଡ଼ କଡ଼ ଲତାପରି 
ମୁଠେ ମାଟି କୁ ଆଉଜି
 
କୁହୁଡ଼ି ରେ ଚାଲୁଚାଲୁ
ନେସି ହୋଇଯିବ କାକର ଟୋପା ଟା ଆଖି ପତାରେ,
ପଛରେ ସେ ଗଙ୍ଗଶିଉଳି  ଫୁଲ  ନେନ୍ଥାଏ ଝରିପଡୁଥିବ 
କଲମ ମୁନରେ।


ମୈତ୍ରେୟୀ କମିଳା

ऐ वतन  मेरे वतन
प्यारा देश मेरा
आज  फिर खुशी की घड़ी   आई
तिरंगा ऊंचा रहे हमारा


तीन रंग का बना है देखो
शान है ये देश का
आओ इसकी गुणगान करे
जान ले क्या है विशेषता

त्याग उत्साह ले आया केसरी
शांति सत्यता सफेद भरा
बिश्वास समृद्धि के साथ है हरा
अशोक चक्र दे याद कर्तब्य हमारा

सीमा पर सैनिक
जब जंग लड़ने को हो तैयार
एक ही तिरंगा याद आये
देश के खातिर  सब कुर्बान

मैत्रेयी कमीला

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

पारमिता षड़ंगी

नाम _ पारमिता षड़ंगी
पति- स्वप्नेन्दु मिश्र
सहर _ कांदिवली, मुंबई
जन्म तिथि_ १३.४.१९७२
जन्म स्थान_निमापडा , ओडिशा
लेखनी_ ओडिआ और हिंदी भाषा में कहानी और कविताएँ
प्रकाशित रचनाएं_ चार कहानी पूस्तकें
सम्मान_ साहित्य दर्पण श्रेष्ठ गाल्पिका, तिसरा किताब ब्रह्मपुर साहित्य संसद द्वारा पुरस्कृत
मेल आइडी_ paramitasarangi1972@gmail.com


 "अनकही"
*************
वहाँ दीवारोँ पर
कुछ ना कुछ लिखा था
पसंद नापसंद करने को
नहीं था विकल्प वहाँ
अवसादों से घिरा
यह उदास शहर
किए जा रहा था समझौता

उसकी नीरव भाषा को
पढ़ नहीं सकती थी मैं
और वह घोषणा किए जा रहा था
शब्दों की मृत्यु की

ऐसी कोई बात नहीं
जो पहले से बताई नहीं गई
क्या सच में
शब्दों की अब
कोई आवश्यकता नहीं
इसलिए शायद इतना
ख़ामोश था यह शहर

अब किसी बगीचे से तोड़ूंगी
शब्दों को रखूंगी
सहेजकर अदिति की अंजुरी में,

मैं कर रही हूं पलायन
एक अन्य बगीचे की ओर
यहां तो लटक रहें हैं
शब्दों के शव।

घोड़े की लगाम खींच कर
देखा ऊपर आकाश में
उड़ रही थी शब्दों की खाल
और यह शहर
डूब रहा था
एक शुष्क
शब्दकोश की अंदर

©पारमिता षड़ंगी।

ओड़िआ

ଶୀର୍ଷକ" ମୋ ଭାରତ"

ତୁ ନେବୁ.... ନେଇ ଯା...
କେତେ ଥର ମୁଣ୍ଡ କୁ ମୋ'ର
ମୁଁ ତ ଶହୀଦ ହେବା ପାଇଁ
ଆସୁଥିବି ବାରମ୍ବାର,

ଗୁଳି ଖାଇଲି ଛାତିରେ
ନଅ ମାସ ର ଗର୍ଭବତୀ ସ୍ତ୍ରୀ ମୋର
ନା ମୋର ଦୁଃଖ ଥିଲା
ନା ସେ ଲୁହ ଝରାଇ ଥିଲା
ଗର୍ଭ ର ପୁଅ ମୋର ସଲାମ
ମୁଦ୍ରା ରେ ପହଁରୁ ଥିଲା ।

କାଲି ସେ ବାପ 
ତା ପୁଅକୁ କାନ୍ଧରେ ନେଲା
ଆଖି ତ ଲୁହ ରେ ଭରା ଥିଲା
ହେଲେ ଛାତି ଟା
ଛପନ ଇଞ୍ଚ ର ଚଉଡ଼ା ଥିଲା।

ଏ ଖାଲି ଏକ ଭୂମି ନୁହେଁ
ଗାନ୍ଧୀଙ୍କ ମଞ୍ଚ ଏ ଦୁର୍ବଳ ନୁହେଁ
ଏ ମଞ୍ଚ କୁ ରଙ୍ଗାଇଛି
ସୁଭାଷ ଙ୍କ ରକ୍ତ
ମା କହିଥିଲା,
" ରଖିବୁ ଭାରତ ର ଟେକ"
ତାବିଜ, ଲକେଟ୍,ମୌଲୀ 
ଲଢିବାରେ ସାହାରା ‌ହେଲା
ମା' ର ଆର୍ଶୀବାଦ ବି 
କୋଉ କମ୍ ଥିଲା।

ଏବେ ଶୁଣ ସୀମା ସେପାରି ରୁ
ବନ୍ଧୁ ର ବନ୍ଧୁକ ମୁଁ
ଭଉଣୀ ର ଵାରୁଦ ମୁଁ
ଧ୍ୱଜ ର ତିନି ରଙ୍ଗ ମୁଁ
ଗଙ୍ଗା ର ପବିତ୍ରତା ମୁଁ
ଚାଲିଛି ସତସିଂହ ର
 ମହାନାଦ ନେଇ

ଆଉ
ତୁ ନେବୁ.... ନେଇ ଯା
ମୁଣ୍ଡ କୁ ମୋ'ର
ମୁଁ ଲଢ଼ୁଛି....ଲଢୁଥିବି ବାରମ୍ବାର।

ପାରମିତା ଷଡ଼ଙ୍ଗୀ

रविवार, 24 नवंबर 2019

नाम: अर्चना पांडेय

नाम-अर्चना पांडेय, जन्म-30 जून, इलाहाबाद, माता, पिता-प्रेमचन्द्र, शांति देवी, पति-तरुण पांडेय, बेटा-विभोर पांडेय, शिक्षा-इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से M.com, गायन एवं साहित्य में रुचि., विशेष कार्य-लेखन में लिप्त 2018 से, लेखन की विधाएँ-कविता , समीक्षा , लघुकथा आदि. 


 माँ
******
एक शब्द नहीं जीवन है पूरा ,
हर प्रेम से ऊपर......
वो नौ महीने पल-पल सहेजती
अपने खून से सींचती।
असीम पीडा़ सह कर जन्म देती , 
अपने अंश को देख गौरवांवित होती।
बड़ा होते देख उसे खुश होती 
इतराती उसकी हर सफलता पर।

हम बड़े हुए...
हुए अपनी दुनिया में मस्त।
नहीं समझ पाते ,
उसके अकेलेपन की
उस पीड़ा को।

एक दिन अपने उसी
अकेलेपन की पीड़ा के साथ
विदा हो जाती है इस संसार से......
दे जाती हमें अनगिनत आशीर्वाद 
क्योंकि वो मां जो थी......
 
 

शनिवार, 23 नवंबर 2019

नाम: मधुश्री देशपांडे गानू

नाम: मधुश्री देशपांडे गानू , शिक्षा: बी .काॅम. मुंबई युनिवर्सिटी.. बर्तमान पता: रसायनी स्थित.. अब तक के साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित': यहां के वृत्तपत्र में एक वर्ष  से मेरी कविताएं प्रकाशित। कई विषयों पर विवरण हिंदी और मराठी भाषा में छप चुका है... 


  *मंजिल*
************
ये जिंदगी है इम्तिहान बहुत लेती है ।।
मत हारना तू हर गली हर मोड़ से
गुजरना है तुझे अपनी मंजिल तक
पहुंचना है तुझे ।।
थक जायेगा अगर थोड़ा सा रूक कर
फिर से चल , चल हिम्मत और लगन से
आस और विश्वास से चल अपने पथ पर ।।
कोई साथी है अगर या अकेला है चल मगर
तू ही अंतःप्रेरणा तेरी तू ही इच्छा कामना तेरी
चलते रहना ही मंजिल है तेरी ।।
ये जिंदगी है इम्तिहान बहुत लेती है ।।
बस लेती ही रहती है........

मधुश्री देशपांडे गानू


नाम- साधना वैद,


नाम- साधना वैद, शिक्षा - स्नातक - जीवाजी विश्व विद्यालय, सन् 1967, सृजनात्मक लेखन, हिन्दी में डिप्लोमा, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्व विद्यालय, (डी सी एच ) - अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा ( पी जी डी टी), एड्स एवं परिवार शिक्षा में प्रमाण पत्र ( सी ए एफ़ ई ), आकाशवाणी आगरा से 1988 से 1995 तक कविताएं, कहानियाँ व अन्य रचनाओं का प्रसारण। 8पुस्तकें प्रकाशित। अनेक साझा संग्रहों में व प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन ! सामाजिक सरोकारों के प्रति गहरी निष्ठा से प्रतिबद्धता। ब्लॉग ‘सुधिनामा’ पर नियमित रूप से सक्रिय, मोबाइल: 9319912798, E-mail-Sadhana.vaid@gmail.com

1.
वृद्ध होकर मैं धरा पर एक दिन गिर जाउँगा 
जानता हूँ मैं किसीके काम फिर ना आउँगा ! 
अब नहीं फलते रसीले आम मेरी शाख पर 
लग रहा बट्टा मेरी ऐश्वर्यशाली साख पर !
हैं नहीं पावन मुलायम पात वन्दनवार को 
पोंछने को हैं न पत्ते पथिक की श्रम धार को ! 
दे नहीं सकता हवा अब मैं किसी भी क्लांत को 
तनिक छाया दे न पाऊँ श्रांत से दिग्भ्रांत को ! 
संकुचित होते विहग भी बैठने में डाल पर 
पड़ न जाए काल की दृष्टि सुखी संसार पर ! 
है झुलाया जिनको वर्षों लोग वो डरने लगे 
टूट ना जाएँ मेरी सूखी भुजा कहने लगे ! 
किन्तु फिर भी हूँ खड़ा मैं आज भी अभिमान से 
हूँ अकिंचन आज पर जीवन जिया है शान से ! 
आज भी है हौसला और जोश भी कुछ कम नहीं 
दिया जो अब तक जगत को मान उसका कम नहीं !
जगत की अवहेलना का दंश चुभता है मुझे 
लिया जिसने ज़िंदगी भर दे सकेगा क्या मुझे ! 
जग मुखर सामर्थ्य पर अवसान पर वह मौन है 
वृद्ध दुर्बल जर्जरों का इस जगत में कौन है ! 
कोई समझे या न समझे है ‘उसे’ सबकी फिकर 
अनवरत संघर्ष पर मेरे ‘उसे’ होता फखर !
किया अभिनन्दन मेरा देकर मुझे सम्मान यह 
है मुझे स्वीकार मन और प्राण से वरदान यह ! 
मुकुट से जो दीखते हैं पात मेरे शीश पे 
किया है श्रृंगार प्रभु ने प्रेम से आशीष दे !

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

लता तेजेश्वर 'रेणुका'

1.भँवर
**********
जिंदगी के भवँर में
कई डूब जाते हैं
कई किनारे पर लगने की 
आशा में हर संभव
प्रयास करते हैं,
लेकिन हर जिंदगी को
किनारा मुनासिब नहीं होता
कोई डूब कर तैर जाता है
कोई तैरते- तैरते डूब जाता है।
कोई चाँद पर चंद्रयान फतह कर 
विजय पताका फहराया है
कोई अपने ही चारों ओर
सरहद बना लिया है।
किस्मत है अपना-अपना
भवँर के चपेट में आने वाले
संघर्षों में से भी कोई
अपना रास्ता खोज लेता है
मंजिल तक पहुँच कर भी कोई 
खुद को खो देता है।

©लता तेजेश्वर 'रेणुका'


2.दर्द बोलता है
***********
दर्द को दबालिया है मैंने सीने में
जब कभी दर्द को जाहिर करने को सोचती 
जुबान बंद कर दिया जाता है
पीड़ा को सह कर
आँखों का पानी आँखों में लिए
देह पर होते बलात्कार की निशानी लिए
जीने को साहस नहीं,
बदनामी का डर
या सभ्य समाज से बहिष्कार का डर
हूँ, चीत्कार करता है मेरा अंतर्मन
समाज ?
कहाँ है समाज -
समाज तो कब का मर चुका है
अगर जिंदा होता 
क्या मेरी अस्तित्व को ऐसे मरने देता?
बेदर्दी के लपटे चेहरे से
इंसान में इंसानियत मर चुका है
वरना बेटियाँ यूँ नहीं मरतीं
कहाँ है इंसाफ
क्यों मरतीं हैं बेटियाँ
एक दूसरे की बचाव में है प्रशासन
क्या बेटी को जीने का हक़ नहीं
या माँ एँ बहिष्कार करें 
ऐसे दरिंदों को जन्म देने से
एक कोख से जन्म लेकर
दूसरे के कोख का मातम मनाते 
ऐसे हैवानों को
क्या जीने का हक़ है
इनका ना कोई उम्र है
ना कोई संवेदना
ऐसे लोगों को
सरे आम फाँसी होना चाहिए
तब डरेगा समाज
तब ही इज्जत करेगा स्त्री का
मरने के भय से
वरना जिंदा नहीं होगा समाज 
कभी भी...
मौलिक : रचना पूरी तरह से मेरी है 
© लता तेजेश्वर 'रेणुका


3.ऐ लड़की!
*********
तू जीत
कभी हार न मान
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
सपना देख उड़ने की
रंगों भरने तेरी दुनिया की
निकलपड़ जीतने को
जीना तेरा हक़
उड़ना तेरा अहम है
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
तू जीत
कभी हार न मान।

न हार तू कभी प्रयत्न तो कर
जीत न सही खुद का यत्न तो कर
हथियार न फैंक समय से पहले
आखिरी कब तक तू चुप रहेगी
सहने की खिताब जीतेगी
कोई नहीं आएगा तेरे साथ
खुद का मदद तू कर
खुद का तू सहारा बन
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
तू जीत 
कभी हार न मान।

दुनिया तोड़ेगी तेरी हिम्मत को
दिखाएगी बदनामी का हद
सिमटकर रहने की सलाह देगी
तोड़ेगी तेरा दिल बार बार
पुरुष के सामने हार मानने
कभी लक्ष्मी भी हुई थी घर से बाहर
तब भी लड़ी थी वह
जब तक जगन्नाथ बलभद्र हार न माने
ना हार मानी थी वह
छोड़ गयी थी आत्मसम्मान से जीने को
ऐ लड़की तुझ पर गुमान है मेरा
तू जीत कभी हार न मान।

पार्वती ने भी छोड़ी थी शिव को
समानता पाने 
अकेली निकल पड़ी थी वह
केदारनाथ व्रत कर 
शिवजी की अर्धशरीर पाई थी 
ऐ लड़की तेरा हक़ न छोड़
तुझ पर गुमान है मेरा
तू जीत
कभी तू हार न मान।

© लता तेजेश्वर 'रेणुका'


4. 
नहीं भूल सकते हम ऐसे वीरों की कुर्बानी
जो दे दिए जान और बना दी कहानी
दुनिया देखती रही और ढेर हो गए सारे
एक ही पल में बिखर गए देश की सेनानी।

पल-पल रास्ते चौराहे पर बिछाए थे जान 
देश की सुरक्षा था जिनके माथे का आन
छोड़ आये थे वे अपने पिता माता को अकेले
किये थे वादा कि देश के लिए देंगे जान।

निभाया है कर्तव्य और लौट आये वापस
कफ़न तिरंगा को लिपटे सीने पर
माँ देखती रही राह निर्जीव आँखों से
बारंबार जन्म होंगे वे, होने को कुर्बान।

सुहागन की चूड़ी टूटी फिर से न जुड़ी
बिखरा काजल ऐसे फिर ना लौटा
कोख में पलरहा है निशानी जो उनकी
फिर होगा कुर्बान बिना कोई शिकन।

जय भारत माता जय तेरे संतान
बार-बार होंगे जन्म, होने को कुर्बान
मेरा देश मेरी मिट्टी न मिटेगी तब तक
जब तक जिंदा रहेगा तेरा ये संतान।
जब तक जिंदा रहेगा तेरा ये संतान।।

© लता तेजेश्वर 'रेणुका'

5.
ऐ वतन ऐ वतन
कसम खाते हैं हम
जब तक जिंदा रहेंगे
ऊँचा रखेंगे तुम्हारा शान।

आकाश की ऊंचाइयों में
फहराएंगे तिरंगा एक दिन
देकर अपना मन प्राण
चुकाएँगे वतन का ऋण।

तेरे देश के पुत्र खड़े हैं
तेरे रक्षा के खातिर
लिए कफ़न सिर पर
हिंदुस्थान का शान बढ़ाने।

जन्म से लेकर आज तक
हर भार मेरा सहा है माँ
हर एक बूँद लहू मेरे 
तेरे लिए ही हो कुर्बान।

©लता तेजेश्वर रेणुका