1.भँवर
**********
जिंदगी के भवँर में
कई डूब जाते हैं
कई किनारे पर लगने की
आशा में हर संभव
प्रयास करते हैं,
लेकिन हर जिंदगी को
किनारा मुनासिब नहीं होता
कोई डूब कर तैर जाता है
कोई तैरते- तैरते डूब जाता है।
कोई चाँद पर चंद्रयान फतह कर
विजय पताका फहराया है
कोई अपने ही चारों ओर
सरहद बना लिया है।
किस्मत है अपना-अपना
भवँर के चपेट में आने वाले
संघर्षों में से भी कोई
अपना रास्ता खोज लेता है
मंजिल तक पहुँच कर भी कोई
खुद को खो देता है।
©लता तेजेश्वर 'रेणुका'
2.दर्द बोलता है
***********
दर्द को दबालिया है मैंने सीने में
जब कभी दर्द को जाहिर करने को सोचती
जुबान बंद कर दिया जाता है
पीड़ा को सह कर
आँखों का पानी आँखों में लिए
देह पर होते बलात्कार की निशानी लिए
जीने को साहस नहीं,
बदनामी का डर
या सभ्य समाज से बहिष्कार का डर
हूँ, चीत्कार करता है मेरा अंतर्मन
समाज ?
कहाँ है समाज -
समाज तो कब का मर चुका है
अगर जिंदा होता
क्या मेरी अस्तित्व को ऐसे मरने देता?
बेदर्दी के लपटे चेहरे से
इंसान में इंसानियत मर चुका है
वरना बेटियाँ यूँ नहीं मरतीं
कहाँ है इंसाफ
क्यों मरतीं हैं बेटियाँ
एक दूसरे की बचाव में है प्रशासन
क्या बेटी को जीने का हक़ नहीं
या माँ एँ बहिष्कार करें
ऐसे दरिंदों को जन्म देने से
एक कोख से जन्म लेकर
दूसरे के कोख का मातम मनाते
ऐसे हैवानों को
क्या जीने का हक़ है
इनका ना कोई उम्र है
ना कोई संवेदना
ऐसे लोगों को
सरे आम फाँसी होना चाहिए
तब डरेगा समाज
तब ही इज्जत करेगा स्त्री का
मरने के भय से
वरना जिंदा नहीं होगा समाज
कभी भी...
मौलिक : रचना पूरी तरह से मेरी है
© लता तेजेश्वर 'रेणुका
3.ऐ लड़की!
*********
तू जीत
कभी हार न मान
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
सपना देख उड़ने की
रंगों भरने तेरी दुनिया की
निकलपड़ जीतने को
जीना तेरा हक़
उड़ना तेरा अहम है
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
तू जीत
कभी हार न मान।
न हार तू कभी प्रयत्न तो कर
जीत न सही खुद का यत्न तो कर
हथियार न फैंक समय से पहले
आखिरी कब तक तू चुप रहेगी
सहने की खिताब जीतेगी
कोई नहीं आएगा तेरे साथ
खुद का मदद तू कर
खुद का तू सहारा बन
ऐ लड़की तुझपर गुमान है मेरा
तू जीत
कभी हार न मान।
दुनिया तोड़ेगी तेरी हिम्मत को
दिखाएगी बदनामी का हद
सिमटकर रहने की सलाह देगी
तोड़ेगी तेरा दिल बार बार
पुरुष के सामने हार मानने
कभी लक्ष्मी भी हुई थी घर से बाहर
तब भी लड़ी थी वह
जब तक जगन्नाथ बलभद्र हार न माने
ना हार मानी थी वह
छोड़ गयी थी आत्मसम्मान से जीने को
ऐ लड़की तुझ पर गुमान है मेरा
तू जीत कभी हार न मान।
पार्वती ने भी छोड़ी थी शिव को
समानता पाने
अकेली निकल पड़ी थी वह
केदारनाथ व्रत कर
शिवजी की अर्धशरीर पाई थी
ऐ लड़की तेरा हक़ न छोड़
तुझ पर गुमान है मेरा
तू जीत
कभी तू हार न मान।
© लता तेजेश्वर 'रेणुका'
4.
नहीं भूल सकते हम ऐसे वीरों की कुर्बानी
जो दे दिए जान और बना दी कहानी
दुनिया देखती रही और ढेर हो गए सारे
एक ही पल में बिखर गए देश की सेनानी।
पल-पल रास्ते चौराहे पर बिछाए थे जान
देश की सुरक्षा था जिनके माथे का आन
छोड़ आये थे वे अपने पिता माता को अकेले
किये थे वादा कि देश के लिए देंगे जान।
निभाया है कर्तव्य और लौट आये वापस
कफ़न तिरंगा को लिपटे सीने पर
माँ देखती रही राह निर्जीव आँखों से
बारंबार जन्म होंगे वे, होने को कुर्बान।
सुहागन की चूड़ी टूटी फिर से न जुड़ी
बिखरा काजल ऐसे फिर ना लौटा
कोख में पलरहा है निशानी जो उनकी
फिर होगा कुर्बान बिना कोई शिकन।
जय भारत माता जय तेरे संतान
बार-बार होंगे जन्म, होने को कुर्बान
मेरा देश मेरी मिट्टी न मिटेगी तब तक
जब तक जिंदा रहेगा तेरा ये संतान।
जब तक जिंदा रहेगा तेरा ये संतान।।
© लता तेजेश्वर 'रेणुका'
5.
ऐ वतन ऐ वतन
कसम खाते हैं हम
जब तक जिंदा रहेंगे
ऊँचा रखेंगे तुम्हारा शान।
आकाश की ऊंचाइयों में
फहराएंगे तिरंगा एक दिन
देकर अपना मन प्राण
चुकाएँगे वतन का ऋण।
तेरे देश के पुत्र खड़े हैं
तेरे रक्षा के खातिर
लिए कफ़न सिर पर
हिंदुस्थान का शान बढ़ाने।
जन्म से लेकर आज तक
हर भार मेरा सहा है माँ
हर एक बूँद लहू मेरे
तेरे लिए ही हो कुर्बान।
©लता तेजेश्वर रेणुका

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें