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शनिवार, 23 नवंबर 2019

नाम- साधना वैद,


नाम- साधना वैद, शिक्षा - स्नातक - जीवाजी विश्व विद्यालय, सन् 1967, सृजनात्मक लेखन, हिन्दी में डिप्लोमा, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्व विद्यालय, (डी सी एच ) - अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा ( पी जी डी टी), एड्स एवं परिवार शिक्षा में प्रमाण पत्र ( सी ए एफ़ ई ), आकाशवाणी आगरा से 1988 से 1995 तक कविताएं, कहानियाँ व अन्य रचनाओं का प्रसारण। 8पुस्तकें प्रकाशित। अनेक साझा संग्रहों में व प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन ! सामाजिक सरोकारों के प्रति गहरी निष्ठा से प्रतिबद्धता। ब्लॉग ‘सुधिनामा’ पर नियमित रूप से सक्रिय, मोबाइल: 9319912798, E-mail-Sadhana.vaid@gmail.com

1.
वृद्ध होकर मैं धरा पर एक दिन गिर जाउँगा 
जानता हूँ मैं किसीके काम फिर ना आउँगा ! 
अब नहीं फलते रसीले आम मेरी शाख पर 
लग रहा बट्टा मेरी ऐश्वर्यशाली साख पर !
हैं नहीं पावन मुलायम पात वन्दनवार को 
पोंछने को हैं न पत्ते पथिक की श्रम धार को ! 
दे नहीं सकता हवा अब मैं किसी भी क्लांत को 
तनिक छाया दे न पाऊँ श्रांत से दिग्भ्रांत को ! 
संकुचित होते विहग भी बैठने में डाल पर 
पड़ न जाए काल की दृष्टि सुखी संसार पर ! 
है झुलाया जिनको वर्षों लोग वो डरने लगे 
टूट ना जाएँ मेरी सूखी भुजा कहने लगे ! 
किन्तु फिर भी हूँ खड़ा मैं आज भी अभिमान से 
हूँ अकिंचन आज पर जीवन जिया है शान से ! 
आज भी है हौसला और जोश भी कुछ कम नहीं 
दिया जो अब तक जगत को मान उसका कम नहीं !
जगत की अवहेलना का दंश चुभता है मुझे 
लिया जिसने ज़िंदगी भर दे सकेगा क्या मुझे ! 
जग मुखर सामर्थ्य पर अवसान पर वह मौन है 
वृद्ध दुर्बल जर्जरों का इस जगत में कौन है ! 
कोई समझे या न समझे है ‘उसे’ सबकी फिकर 
अनवरत संघर्ष पर मेरे ‘उसे’ होता फखर !
किया अभिनन्दन मेरा देकर मुझे सम्मान यह 
है मुझे स्वीकार मन और प्राण से वरदान यह ! 
मुकुट से जो दीखते हैं पात मेरे शीश पे 
किया है श्रृंगार प्रभु ने प्रेम से आशीष दे !

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