15अगस्त को 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' संस्था के संस्थापक आदरणीय तेजेश्वररावजी और संस्था की अध्यक्षा श्रीमती लता तेजेश्वर 'रेणुका'जी ने संस्था की ओर से पुस्तक लोकार्पण और काव्यसम्मेलन का आयोजन किया। प्रथम सत्र में राष्ट्रीय गान और सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शूभारम्भ हुआ। कार्यक्रम अध्यक्ष और INB के प्रकाशक डॉ संजीव कुमार(दिल्ली), मुख्यातिथि श्री संजीव निगम(मुंबई), विशेष अतिथि डॉ एस कृष्णबाबूजी(A.P) और संतोष श्रीवास्तव (औरंगाबाद) रहे। श्रीमती लता तेजेश्वर रेणुका जी का 8वा पुस्तक 'लहराता चाँद' जो कि उपन्यास है का भव्य लोकार्पण के बाद श्री मोतीलाल दास और पूर्णिमा पांडेय जी ने पुस्तक पर अपने व्यक्तव्य प्रस्तुत किया। आमंत्रित अतिथिवृन्द ने उपन्यास 'लहराता चाँद' पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्यसम्मेलन का आयोजन था जिसमें डॉ रोचना भारती जी ने अध्यक्षता की मुख्यातिथि ओडिशा के अकादमी पुरस्कार विजेता बंशीधर षडंगी विशेष अतिथि, देवुलापल्ली पद्मजा और मोतीलाल दास ने किया। दोनों सत्र में संचालन अश्विन उम्मीद और डॉ उषा साहू ने की। डॉ मीना गुप्ता ने आभार प्रकट किया।
कार्यक्रम अध्यक्ष संजीव कुमार जी ने कहानी को ज्योतिष शास्त्र को जोड़ते हुए कहा राहु और केतु की नेगेटिविटी और पाजिटिविटी दोनों इस उपन्यास में है। रोचकता से भरी उपन्यास पढ़ना शुरू करते हैं तो आप आखरी तक पढ़ते जाते हैं। लहराता चाँद में मन की चंचलता है, मन का क्षमता है, मन का अक्षमता है, विषाद है, मन का प्रमाद है। और लेखिका से आग्रह है चाहे आप किसी विधा में लिखें लेकिन उपन्यास जरूर लिखतीं रहें ऐसी किताबें समाज के लिए बहुत प्रेरक बनती हैं।
श्रीमान संजीव निगम जी ने कहा भूमिका लिखने जैसे मुझे पांडुलिपि मिला शुरू करते ही एक सांस में पढते चला गया। उन्होंने एक विशेष कही कि बेटी नायिका की भूमिका में होती है लेकिन जब आप कहानी पढ़ते जाओगे तो लगेगा उसका पिता कहानी का नायक है, और उपन्यास पढ़ते हुए कभी निर्भया की याद आती है तो कभी हैदराबाद की लड़की जिसे जलाया दिया गया था उसका दर्द दिल में चुभता है। शीर्षक 'लहराता चाँद' वह है जो हमारे करीब हमारे आसपास ही जल में लहराते दिखता है।
श्री मोतीलाल जी ने कहा, जैसे ही उपन्यास पढ़ते जाते हैं तो प्रतीत होता है कि कहानी दो कदम आगे बढ़ती है तो एक कदम पीछे जाता है। यानी आगे बढ़ने के साथ ही अतीत के लम्हों को भी बताते हुए चलता है। यह एक शोध पूरक उपन्यास भी कहा जा सकता है जिसमें रम्या एक मानसिक रोग से ग्रसित होती है जिसके बारे में लेखिका ने विवरणात्मक जानकारी भी दिया है।
संतोष श्रीवास्तव जी ने कहा, मुझे किताब आज ही मिली है लेकिन लता जी की लेखनी को अच्छे से पहचानती हूँ, उनका उपन्यास सैलाब का भूमिका मैंने ही लिखी थी, आप की उपन्यास को जरूर पढूँगी और विस्तार से लिख भेजूँगी। और आपकी हिंदी में पकड़ बहुत सराहनीय है।
आदरणीय डॉ कृष्णबाबू विशाखापटना से कहा, यह परिवारात्मक कहानी है जिसके चरित्र हमारे आसपास ही जीते हैं, चूंकि आज के परिवार बिखरता जा रहा इस दौर में ऐसी चरित्रात्मक किताबें समाज को चाहिए। उन्होंने किताब को परिवारवाद के विषय पर शोध करने देने की बात कही।
पुर्णिमा जी ने कहा लता जी ने नशा मुक्ति, भ्रष्टाचार महिलाओं के डिप्रेशन जैसे कई सामाजिक मुद्दा उठाए हैं और मुद्दा उठाकर नहीं छोड़ा बल्कि समस्या का समाधान तक करके छोड़ा है। उपन्यास में महिलाओं की विभिन्न चरित्र को और उनके मानसिक द्वंद को उकेरा है और उस मानसिक द्वंद से सफलता पूर्वक उबरने के रास्ता भी दिखाया है। मुझे तो यह लगता है कि लहराता चाँद एक संतुलित फ़िल्म की तरह है जो सभी तरह पात्रों के साथ एक स्वथ्य मनोरंजन करता है।
लता जी ने 'लहराता चाँद' जल में प्रतिबिंबित सी रम्या का जीवन को बताया जिसके मौत के बाद भी संजय ने उनके प्रति प्रेम को आखरी तक अपने अंदर कई उथल पुथल के साथ भी जिंदा रखा जैसे कि पानी में लहराता चाँद की आभासी प्रतिछवि।
दूसरे सत्र में कार्यक्रम अध्यक्षा डॉ रोचना भारतीजी, मुख्यातिथि और अकादमी अवार्ड से पुरस्कृत श्री बंशीधर षडंगीजी, देवुलापल्ली पद्मजा और श्री मोतीलाल साहूजी ने अपना व्यक्तव्य दिया। रोचना भारती जी ने बधाई के साथ काव्यसम्मेलन में आमंत्रित रचनाकार मंजूला पांडेय, वंदना श्रीवास्तव, परिमिता षडंगी, अरुंधति महंती, मधुश्री गानू, मीना गुप्ता, लता तेजेश्वर, डॉ पद्मजा, आश्विन उम्मीद, उषा साहू, मीना गुप्ता, मोतीलाल दास, हिना मोदी ने स्वारचित काव्य पाठ्य किया। प्रथम सत्र में अश्विन उम्मीद और दूसरे सत्र में उषा साहू ने संचालन किया। मीना गुप्ता जी ने आभार प्रकट किया।
रोचना भारती जी ने लता जी को उपन्यास लोकार्पण के लिए बधाइयां देते हुए अपनी कविता के कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं :
चिलचिलाती धूप में कहीं दूर
मृग मरीचिका सी आशा सुदूर ,
जल बिन्दुओं से झलकती
कल्पना ही कल्पना नहीं है कविता ।
कुछ स्नेहिल कुछ मर्मान्तक
जितना कहना चाहा ,
जितना शेष रहा कहा-अनकहा
कह जाती है कविता ।
मुख्यातिथि बंशीधर षडंगी जी ने कहा हम अपने भाव प्रकाश करने के लिए कई बार साहित्य में भी कुछ बातों suppress करना होता है जो पाठक के मन को खिंचाता है पढ़ने के लिए। कविता और कहानी में रहस्य और समाज के लिए message होना जरूरी है। उनकी कुछ पंक्तियाँ :
ଜ୍ୟୋତିଷ ର ଆଙ୍ଗୁଠି ଅଗରେ ଭବିଷ୍ୟତ
ବିପଥ ଜଙ୍ଗଲ ମଝିରେ ଇତିହାସ
ଭୋକ ପେଟରେ ଅନାଥ ଶିଶୁ
ଅସରପା ଓ ଝିଟିପିଟି ଗୋଡ଼ରେ ଗତି
ଛିଣ୍ଡା ମସିଣାରେ ଭାରତ ବର୍ଷ
ज्योतिष के उंगली की नोक पर भविष्य
विपथ जंगल के बीच में इतिहास
भूख के पेट में अनाथ शिशु
तिलचट्टा और छिपकली के पाँव में गति
टूट हुई चटाई में भारत वर्ष
मोतीलाल दास जी की कविता :
दिल में है आग़ और आंखों में तूफान है
इस देश पर मर मिटने की यही पहचान है
हे देशवासियों तुम हमेशा सुकून से रहना
तुम्हारी सलामती में हमारी जान कुर्बान है.।
देवूलपल्ली पद्मजा जी की पंक्तियाँ:
ఓ భారత పుత్రా! వీరపౌత్రా!
స్వాతంత్ర్య భారత రక్షణ భారం నీదేరా
ప్రశాంత భారత ధరిత్రి హద్దున శతఘ్ని శబ్దపు అశాంతిలో దేశశాంతికి కలిగెను విఘాతమూ
స్వతంత్ర భారత రక్షణ భారం నీదేరా...
ओ भारत पुत्र, वीर पुत्र
स्वतंत्र भारत का रक्षा का भार तुम्हारा है
प्रशांत भारत धरित्री ...
अश्विन उम्मीद जी की पंक्तियाँ
कविता लिखना ग़ज़लें कहना सबके बस की बात नहीं
आईना दिखलाते रहना सबके बस की बात नहीं
लंबी लंबी तहरीरें तो कोई भी लिख सकता है
कम लफ़्ज़ों में ज्यादा कहना सबके बस की बात नहीं।
उषा साहू जी की कविता की दो लाइनें :-
अब तो बदल गई सब रीत,
कृषक जी रहे कर्ज के बीच ।
बेटी आ न पाई अब पीहर ,
माता पिता की टूटी आस ।
ये कैसा सावन है आया,
कोई खुशियां साथ न लाया ।
वंदना श्रीवास्तव जी की पंक्तियाँ:
हमने चढ़ते हुए सूरज को भी ढलते देखा!
बड़े बड़ों का यहां वक्त बदलते देखा!!
देख अपनों की खुशी, अपने ही जला करते हैं!
खून पानी में कितनों का बदलते देखा!!
आप करते रहें बातें ये रिश्ते नातों की,
फूल माली को भी मुट्ठी में मसलते देखा!!
मधुश्री गानु जी की हिंदी कविता
"बलिदान कब तक?"
हर मां , बहू , बेटी का बलिदान ,
अभिमान, सम्मान इस भूमि का..
शीश उठाकर साथ खड़े रहेंगे ,
वादा है तुझसे हर हिन्दुस्तानी का......
अरुंधति महान्ति जी की ओड़िआ कबिता
*ଅବସୋସ*
କାହାକୁ ଦେଖେଇ ପାରିଲି ନାହିଁ
କି ଫୋପାଡ଼ି ପାରିଲି ନାହିଁ
ସାଇତିଲେ
କାହା ନଜରରେ ପଡ଼ିଯିବ କାଳେ
ଛାତିର ମୁଠୁଣି ଭିତରେ
ମୋଡ଼ି ମକଚି
ମୁଠେଇ ଧରିଛି ।।
*अफसोस *
किसीको दिखा न सकी
ना फैंक सकी
समेटने से
कहीं किसको नज़र ...
डॉ मंजुला पांडेय की पंक्तियाँ:
उल्लास
तारों से सजके चली जाती है
धरती मिलने को अपने सूरज से
जाता है मेघ प्रियतम बनकर
झांकता है निहारता है
अपनी प्रियतमा को
जो करती है इंतजार
होकर खड़ी खिड़की के पास
टकटकी लगाए बड़ी आस से....।
मीना गुप्ता जी की कविता की पंक्तियाँ
मेरे देशवासियों क्या तुम मुझको भूल गए
मैं हूं फौजी मैं हूं एक सिपाही
देश की हिफाजत के लिए कुर्बान हो जाता हूं
जन्मदात्री माँ को छोड़ धरती मां का कर्ज चुकाता हूं
भरकर लोहा रगों में दुश्मन से भीड़ जाता हूं
पिता की घनी छांव को छोड़कर गोली बारूद सीने पर खाता हूं
लता तेजेश्वर रेणुका जी की पंक्तियाँ
शहिद की वर्दी
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मैं उस शहीद सैनिक के शरीर की वर्दी हूँ
जिस पर कई गोलियाँ छेद कर निकल गईं।
रक्त सिक्त मेरे शरीर के
बून्द बून्द पशीने रक्त से मिल रहे थे ।
खून से भरी वर्दी का गंध दूर तक फैल रहा था
किसी झाड़ियों में उसकी प्राणहीन
शरीर के टुकुड़े लटक रहे थे, ...
पारमिता षडंगी जी की पंक्तियाँ
भारत के वीर
ले जा.... तुझे लेना है
सिर को मेरे ... कितनी बार
शहिद होने के लिए, में तो
आऊंगा बार-बार,
गोलि खाई छाति में
नौ महीने की गर्भवती स्त्री ...