प्रस्तुत कविताएँ
1. *आखेट*
मत करो आखेट उनका
जो तुम्हारे पास हैं ।
जंगलों में अब नहीं
कोई पखेरू खास हैं ।
मित्र पंछी नहीं मिलते
खोजने पर आजकल ।
कष्ट देता है प्रदूषण
छीनता सुख शान्ति पल ।
शोध वैज्ञानिक बताते
विष-कणों को छानकर ।
व्याधि-तृष्णा-आपदा
संकट समस्या जानकर ।
स्वच्छ पर्यावरण के
सबको पता हों फायदे ।
करो पालन सदा ही
जो भी सुरक्षा कायदे ।
रोक दो बढ़ता प्रदूषण
वृक्षारोपण करो जम ।
शुद्धता व स्वच्छता पर
नजर रखो हर कदम ।
2. *धारा*
कंकड़ जिसके चुभे नहीं
कभी पाँवों में ।
वो क्या समझे दर्द दूसरों
के पाँवों में ?
धोये चरण बैठ श्रमिकों के
वही कभी भी,
कंकड़ जिसके चुभे कहीं
कभी पाँवों में ।
अच्छा-बुरा कहे चाहे कोई
सुबरन तो सुबरन रहता ।
कीमत भाव बदलते रहते
जग जीवन वर्णन करता ।
कान्ति कर्महित नहीं हों धूमिल
देखो नैन उघार के,
कपटी झूठा धूर्त चपल चित
खोखला आकर्षण करता ।
धर्म सनातन संस्कृति धारा
प्रेम भाव लेकर बहती ।
आदर सब धर्मों का करके
नीति-रीति मर्यादा कहती ।
पूजनीय चर-अचर सभी हैं
कण-कण में रहते ईश्वर,
धर्म सनातन संस्कृति धारा
सुहृद भाव संग रह बहती ।
3.*संवेदना*
अनल अनिल नभ नीर भू
पालक प्रकृति सुवास ।
सुमन लता वन वृक्ष फल
साधक भरि उल्लास ।।
राम नाम जे जन उर धरहीं ।
तिन मन सुख सन्तोष संवरहीं ।।
विषय परिस्थिति परिचित प्रज्ञा ।
कोमल चित कुल स्वार्थ अवज्ञा ।।
देह गेह अरि मित्र समाना ।
भल अनभल कर्तव्य गुमाना ।।
बाल सुलभ मन जो करि राखा ।
पुलकित भाव उमंग सो पाखा ।।
होहिं मुदित मुनि सुर नर नारी ।
जब अनुकूल प्राप्त दिन चारी ।।
फूलहिं फलहिं न बेत बिधाना ।
चहे बरसहिं घन अमृत माना ।।
जप तप व्रत सेवा सुखदाई ।
निर्मल निश्छल उर हित पाई ।।
सुख-दुःख लाभ-हानि मद कामा ।
जोग भोग परसहिं जन धामा ।।
हठधर्मी मद विजय पराजय ।
भ्रमित जीव बल बुद्धि न छाजय ।।
जहाँ सुमति तहाँ सुख पथ रेखा ।
कुमति कुभाव न सद्सुख लेखा ।।
खुशी होइ परसुख लखे
विजय प्रगति सुनि जाग ।
विश्व सराहे मनुज मति
प्रेम धर्म सुचि भाग ।।
4. *अब और तब*
ना वो हवाएँ रहीं
ना वो फिजाएँ रहीं ।
ना वो महबूब रहे
ना वो अदाएँ रहीं ।
पीपल के पेड़ पर
चढ़ने-चढ़ाने का
दौर ही कुछ और था ।
गाँव के तालाब में
कुएँ की जगत पर
बैठकर नहाने का
ठौर ही कुछ और था ।
ना वो दवाएँ रहीं
ना वो दुआएँ रहीं ।
ना वो साथी दिखे
ना वो सभाएँ रहीं ।
लपटू-डंडा खेलते थे
आम के बागों में कभी ।
उनके सूखे पत्तों की
फिरकी बनाते थे तभी ।
ना वो बाग रहे ।
ना वो बागबाँ रहे ।
ना वो तालाब रहे
ना वो कुमुदिनी रहीं ।
अब और तब के
जीवन में फर्क
दिखता कुछ और है ।
है तो बहुत कुछ
लिखने को शेष
पर लेखन से जुड़ी
यादों में
आँख मारने का ठौर है ।
मालूम है परिवर्तन
प्रकृति का नियम है ।
सच तो यही ईश्वरीय
कृति का अधिनियम है ।
ना वो पंडित रहे
ना वो शिखाएँ रहीं ।
ना वो वृक्ष रहे
ना वो विभाएँ रहीं ।
हाँ आज भी दुआएँ हैं
व्याधि-दर्द की दवाएँ हैं ।
संवेदनाओं को
फूल व पत्थर भी
बनना पड़ेगा किसी
निर्णायक घड़ी में
क्योंकि सुख चैन
का पलना चाहते
ललन व ललनाएँ हैं ।
5. *सावधान*
सावधान हो जाओ बुलबुलो,
चमन तुम्हारा उजड़ न जाये ।
पहचानो मधुवन माली को,
जो दे सुरक्षा चमन बचाये ।।
सींच रहा है जो नित उपवन,
खर-पतवार को ढूँढ़ निकाले ।
कलियों की भी करे सुरक्षा,
डाल उर्वरक पौध को पाले ।।
आँधी-तूफानों को रोकना,
माना उसके नहीं है वश में ।
फिर भी करता है प्रयास वह,
ना क्षति हो उपवन यश में ।।
माली है अभिमन्यु दिखे,
दुर्योधन जैसों से लड़ता ।
नेह भक्ति गुण धर्म कर्म से,
पथ पर आगे है बढ़ता ।।
सुमन देखते हैं माली को,
चमन सनातन इसे पहचाने ।
घाटी माटी हिन्द की महके,
विश्वबन्धु ही कहना जाने ।।
वीर शहीदों के उपवन को
भक्त हिन्द के सींच रहे ।
त्याग प्रेम बलिदान परिश्रम
ध्यान जनों का खींच रहे ।।
विश्वम्भर दयाल तिवारी
पता
•••••
ए-302 , कृष्णा रेजीडेन्सी सीएचएस
खारघर , नवी मुम्बई
410210 महाराष्ट्र
ईमेल : tewarivd@gmail.com
चलभाष : 7506778090.
*परिचय*
******
नाम-विश्वम्भर दयाल तिवारी
माता- स्मृतिशेष श्रीमती कमला तिवारी
पिता-स्मृतिशेष श्री लालजी प्रसाद तिवारी
जन्म-स्थान
****
ग्राम-सुन्सी
पोस्ट-ओयल
जिला-लखीमपुर-खीरी
शैक्षणिक योग्यता
*********
ए•एम•आई•ई (मैकेनिकल)
संप्रति-पूर्व वैज्ञानिक अधिकारी
अभिरुचि- पठन-लेखन
एकल काव्य-संग्रह : काव्यांकिता,रश्मि-ऋषिका,गरिमार्चना,उरोज्ज्वला,
कीर्तिप्रभा ,वन्दिता
एकल लघुकथा संग्रह : छप्पर की छाँव
साझा काव्य-संग्रह
••••••••••••
* सहोदरी सोपान - 4, काव्य-करुणा, अरुणोदय
* शुभारम्भ , साहित्य समर्पण, उजेश, अग्निशिखा काव्यधारा, काव्य-धारा, दिवित
पत्रिकाओं में रचनाएँ
••••••••••••••
* वैज्ञानिक, संस्कृति , ऊर्जायन, गतिमान, अग्रिमान, कथाबिंब
साझा लघुकथा संग्रह
•••••••••••••••
* शब्द लिखेंगे इतिहास
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें