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रविवार, 16 जून 2024

नूरसब्बा श्यान जी की 5 कविताएँ


Noorusaba shyaan, thane
नूरुस्सबा शायान टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज में अठारह साल से कार्यरत।  अठारह साल की उम्र में पहली कविता।लिखी और यह शौक बढ़ता ही गया।  अब तक कई कविताएं, लघुकथाएं और नज़्में प्रकाशित हो चुकी हैं।



1: आंटे का गोला 
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किस तरह समेट लेती हो खुद को हर दस्तूर के खांचे में
ख्वाहिशें तो रास्ता मांगती होंगी
दम तो घुटता होगा जब खुद को बांधा होगा साड़ी के इर्द गिर्द
जब अरमानों को कस के बांधा होगा दुपट्टे की जानिब
सांस लेने में तकलीफ भी हुई होगी जब हवा को रोका होगा पर्दे की ख़ातिर
चीख़ नही निकली तुम्हारी जब पैरों की पाज़ेब को बेड़ी बनाया गया
जिस्म नही चरमराया तुम्हारा जब ज़बरदस्ती हया का रंग चढ़ाया गया
औरत हो आटें का गोला नही
याद तो है न तुम्हे।।।।


Noorusaba shyaan
2.कमसिन सी लड़की 
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पुरानी एलबम मे ईक कमसिन सी लड़की मिली 
आँखों में चमक होठों पर मुस्कान खिली खिली 
देख कर उसे मुझे हुई बहुत हैरानी 
अपनी सी लगी थी जानी पहचानी 
झट से मैने आईने में खुद को देखा 
चेहरे पर नुमाया थी वक़्त की रेखा 
आँखों में बस गए थे फिक्रों के डेरे 
 होठों पर तब्बसुम भी अधूरे अधूरे 
खुशबाश सी वह लड़की अब औरत हो गई थी
बेवजह की परेशानियाँ उसकी आदत हो गई थी

 Noorusaba:
3. मुमकिन नही 
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लम्हों को कैद करने का चलन भी है क्या अजीब 
समेट लो इन यादों को जो हैं इस दिल के करीब ।
कैद तो कर लूं ये धुंध ये छटा ये बारिश की बूंदें 
कैद कैसे करूं जो तू सोच रही थी अपनी आँखें मूंदें। 
कैद हो सकते है हवा में झूमते पत्ते फूलों पर शबनम के कतरे 
कैद होगी कैसे भला मिट्टी की सोंधी खुशबू फिज़ा के ठण्डे झौंके।
कैद तो कर लूं अपनी पहली मुलाकात तेरी वह पहली झलक 
कैद होगी भला कैसे तेरे चहरे की हया,शर्म से बोझिल पलक ।
मुमकिन नही सब कुछ कैद कर पाना 
बहतर है लम्हों को उसी पल में जी जाना ।।

 Noorusaba:
4. ग़ज़ल 
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 मुकम्मल हो जाएगी मोहब्बत मेरी
ताउम्र कर सकूं गर हिफाज़त तेरी

कितना भी रहे तू लाताल्लुक मुझ से
मेरे वजूद में बाक़ी रहेगी चाहत तेरी

तेरी आँखों के टूटे बिखरे से ये ख़्वाब 
पलकों पर सजें हैं बनकर हसरत मेरी

दुआ में बारहां बस तुझे ही मांगा है
देखें कब कूबूल होती है इबादत मेरी

बहुत महंगा पङा तेरे प्यार का सौदा 
उम्र गवां कर अदा की है क़ीमत तेरी

आसान होता अगर तुम जान मांग लेते 
तुम ने तो मांग ली है मुझसे किस्मत मेरी
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5. ग़ज़ल 

कभी कुछ न कर के भी देखो
खुद के अंदर उतर के भी देखो
नए रास्ते तलाशते रहते हो क्यूं
कभी ज़रा देर ठहर के भी देखो
ये फरमाबरदारी दम घोंट देगी
कभी खुुद से मुकर के भी देखो
कब तक खुद को संभाले रहोगे
कभी ग़म में बिखर के भी देखो
बहुुत जी लिए ज़माने के तौर से
कभी बेेवजह संवर के भी देखो

नूरसब्बा श्यान, नविमुम्बई

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