सेवासदन प्रसाद, नविमुम्बई जी की लघुकथाएं
1) उत्सर्गी
एन डी आर एफ की टीम जब बिल्डिंग के करीब पहुंची तो बाढग्रस्त परिवार के चेहरे पे खुशी की चमक छा गई। बोट पर पहले से ही कुछ बुजुर्ग सवार थे।
रेस्क्यू टीम ने सर्वप्रथम बीमार, वरिष्ठ नागरिक एवं बच्चों को उठाया। तभी एक बुजुर्ग ने कहा--" पहले मेरे पोते एवं इसके माता- पिता को ले जाओ। बच्चे को माता- पिता का गोद एवं वात्सल्य का स्पर्श ज्यादा जरूरी है। मुझे दूसरे फेरे में ले जाना।
टीम ने उसकी बात मान ली। जब बोट चल पङी तो बुजुर्ग को अपने निर्णय पर गर्व महसूस हुआ। वह अपलक जाते हुए वोट को निहारता रहा ।मानो एक उङनखटोला उसके पोते को खुशियों की दुनियां की सैर कराने ले जा रहा हो।
एन डी आर एफ की टीम उनलोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा कर तुरंत वापस लौटी। जल्दी-जल्दी बुजुर्ग को उठाकर बोट पर बिठाया। तभी उसका सर एक तरफ लुढ़क गया पर चेहरे पर निश्चिंतता के भाव दिखाई दिए।
सेवा सदन प्रसाद
2) ***** चक्करघिन्नी ******
-- बेटा, जल्दी से यूनिफार्म पहन ,तब तक मैं टिफ़िन रेडी कर देती हूं।
-- वीणा, मेरा नाश्ता रेडी है या नहीं- - लेट हो रहा है।
-- हां, बैठिए अभी नाश्ता लगाती हूं।
-- बहू , देखो दूधवाला आया है, जरा हिसाब कर दो ।
-- अम्मा, उसे कह दीजिए संडे को आए।
-- मम्मी, मेरे मोजे नहीं मिल रहें हैं।
-- बेटा, मैंने धो दिए थे ।जरा बालकनी में चेक कर लो।
-- वीणा- - नाश्ता ?
-- हां, ला रही हूं।
-- बहू, जरा एक कप चाय बना देना फिर तो सारा दिन मुझे ही सब करना है।
-- मम्मी, आपने रिपोर्ट कार्ड पर अभी तक साईन नहीं किया।
-- पापा से करवा लो।
-- मुझे लेट हो रहा है। बाॅस के साथ आज इंपार्टडेंट बिजिनेस मीटिंग है।तुम रिपोर्ट कार्ड देख लो।सोच - समझ कर साईन करना वर्ना क्लास टीचर के ताने सुनने पङेंगे।
-- मम्मी- मम्मी, देखो बाजू वाली आंटी आई है।सोसायटी के लिए कुछ बात करना चाहती है।
-- बेटा, कह दे मैं शाम को मिल लूंगी -- अभी बिजी हूं। आज नौकरानी भी नहीं आई।
-- बेटा, तू और देर न कर -- स्कूल बस का टाइम हो रहा है।
-- बहू, अभी तक चाय नहीं मिली।
-- दे रही हूं मां जी -- जरा खौलने दीजिए मेरी तरह ,तभी तो स्वाद मिलेगा।
काफी भागम-भाग के बाद स्वयं बिना नाश्ता किए ,टिफ़िन लेकर चल पङी। अब लंच टाइम में ही कुछ खा लेगी।तभी सामने बास नजर आया। उसे उपर से नीचे तक निहारते हुए कहा-- " आप बहुत स्लो होती जा रही हैं। जमाना तेजी से आगे बढ रहा है। आप कंपनी के नुकसान की वजह न बनें। "
वीणा क्षमाभाव से सर हिलाती हुई अपनी सीट की ओर बढ गई।सीट पर बैठते ही फोन की घंटी, पङोसी का उलाहना, चपरासी द्वारा पेंडिग फाइलों का बंडल और पुनः बाॅस का काॅल।वीणा पल्लू से माथे का पसीना पोंछतें हुए चेहरे पे दिखावटी मुस्कुराहट लाते हुए बाॅस के केबिन की ओर बढ चली।
सेवा सदन प्रसाद
***** ताई की भरपाई *****
सत्तर वर्ष की गंगूबाई अब भी फुटपाथ पे भाजी बेचती। पति को भगवान ने छीन लिया और बेटा को एक्सीडेंट ने। बहू तीन- चार घरों में चौका बर्तन करती तो गुजारा हो जाता पर दो बच्चों की पढाई भी तो जरूरी है। अतः फुटपाथ पे भाजी बेचती। कभी-कभी नगरपालिका वालें सब उठा कर ले जातें तब गंगूबाई चुप रह जाती।
उसे पता है कि फुटपाथ पे भाजी बेचना गैरकानूनी है, अतः विरोध नहीं करती। पुनः नये जोश से जुट जाती।गंगूबाई सिर्फ हाथ जोङना जानती है, हाथ फैलाना नहीं।
सुबह से बिक्री अच्छी हो रही थी। तभी एक महिला आई। महिला के आते ही गंगूबाई ने बेर के ऊपर कपङा डाल दिया। महिला को खामोश देखकर गंगूबाई बोली-- " काय,पाहिजे बाई ,सगङे भाजी ताजी है। "
" पर इस टोकरी पे कपङा क्यों डाल दी ? महिला ने पूछा।
तब गंगूबाई बोली -' " इसमें बेर है- - सुबह से एक- एक, दो - दो बेर सबने चखे पर खरीदा किसी ने नहीं- - ढाई किलो बेर लाई थी- - आधा किलो लोगों ने चख लिए। "
" पर मैं तो बेर लेने ही आई हूं-- सारे बेर दे दो और ढाई किलो का दाम ले लो। "
" क्यों, जितना वजन होगा उतने का ही पैसा लूंगी। "
" अरे! लोगों ने तेरे बेर खायें- -तुम नुकसान क्यों सहोगी ? - - समझो वो सब मेरे अपने हैं-- मैं भरपाई करूंगी। "
पर गंगूबाई नहीं मानी। फिर महिला ने सारे बेर ले लिए और पैसे देते हुए बोली-- " ठीक है, जितना उचित समझो काट लो। "
महिला थैली से निकाल कर एक बेर खाई। बेर खाने के बाद बोली-' " ताई बेर तो खट्टे हैं ।"
गंगूबाई सकपका गई। गंगूबाई जहां से भाजी लाती है, वे लोग अच्छें हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ। गंगूबाई डरते-डरते बेर खाई फिर तुरंत बोली-- " अरे! बाई काय सांगते - - कित्ती मीठी बेर है। "
फिर महिला ने कहा-- " सुबह से सबने बेर चखा पर तुम खुद नहीं खाई इसीलिए मैंने ऐसा कहा। फिर मुट्ठीञ भर बेर देती हुई बोली-- " खाओ इसे मेरी तरफ से। "
गंगूबाई दो बेर ही खा पाई थी कि नाती- नातिन की याद आ गई और बाकी बचे बेर आंचल में बांध ली।
सेवा सदन प्रसाद
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