नाम : मोतीलाल दास।।
ई-मेल: motilalrourkela@gmail.com
प्रकाशन:275 कविताएँ देश के विभिन्न 85 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता संग्रह - आखिर क्या करता, देह पर दिन की भाषा, समय के ढेर पर - कविता संग्रह
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भाषा : हिंदी
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लेख एक लड़की की
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मैं चाहती हूँ जीना और
मरना ठीक समय पर.
मैं चाहती हूँ अंकुरना
बीजों की तरह और
बढ़ना लताओं की तरह
ढलना भी चाहती हूँ चाँद की तरह
और उगना भी सूरज की तरह.
मैं चाहती हूँ मिटना
लहर की तरह और
बिखरना फ़सलों की तरह
जलना भी चाहती हूँ चूल्हे की तरह
और चाहती हूँ खाली होना
पेट की तरह।
मैं चाहती हूँ खिलखिलाकर हँसूँ
या फिर रोऊं जी फाड़ कर
किसी भी तरह.
पर मेरे चाहने से ही
नदी मेरे आँगन में नहीं बहेगी
मैं जितना मरना चाहती हूँ
वो उतना ही जिंदा रखना चाहते हैं
एक गीली लकड़ी की तरह।
2. अलिखित कविता
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मेरी देह में चिपकी हैं कई कविताएं
तुम उसे जरा गौर से पढ़ना
उन कविताओं में
धड़कती है मेरी मन की बातें
मैं जानती हूं तुम इसे न पढ़ पाओगे
तुम्हें तो सिर्फ देह की सुंदरता दिखेगी
वैसे भी कविता के भीतर उतरना
तुम्हारी फितरत नहीं जबकि
मैं सिर्फ देह नहीं तुम्हारे लिए
इन सबसे परे सबसे पहले
मैं अलिखित कविता हूँ
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