नाम -डॉ गंगा प्र शर्मा'गुणशेखर
संप्रति-अध्यक्ष,देज़ेयोर्ग अन्तर्राष्ट्रीय भाषा संस्थान,सूरत, पूर्व प्रोफेसर, गवांगज़हौ, चीन, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के हिंदी के आधार पाठ्यक्रम में 'ऐन इंट्रोडकटरी हिंदी रीडर'और 'अ कन्साइज ग्लोसरी ऑफ़ अरेबिक ऐंड पर्सियं टर्म्स', कविता, कहानी और आलोचना, दलित साहित्य में विशेष दखल, चीन के हिंदी पाठ्यक्रम में सम्मिलित तुलसी सम्मान, विश्व हिंदी सेवी सम्मान
अवधि
********
दोहे'
1-बेटवा जबते बड़े भे ,दिलु भा रेगिस्तान।
फिर हूँ ममता मातु की ,सींचइ फ़सल सुखान।।
(बड़े हुए पर पुत्र का, दिल था रेगिस्तान।
फिर भी ममता सींचती,आई फ़सल झुरान ।।)
2-जरिया सारी बेंचि कइ,जीका किहिसि इलाजु।
धरिसि गड़ांसा गरे पर, वहइ पुतउना आजु।।
(सारी ज़रिया बेंचकर,जिसका किया इलाज।
उसी पुत्र ने गले पर,रखा गंड़ासा आज।।)
3-कुछु मा कुछु लगबइ करी, रंगु हमारे अंग।
इउ कहबुइ बेकार हइ, 'का करि सकत कुसंग'।।
(कुछ ना कुछ तो लगेगा, रंग हमारे अंग।
यह कहना बेकार है,का करि सकत कुसंग।।)
4-मँहगाई की मार मा, बचइ न ध्याला सेस।
नेता अफसर भ्रस्ट तउ ,सुखी न होई देस।।
(मँहगाई की मार से ,बचे न धेला शेष।
नेता अफसर भ्रष्ट तो,सुखी न होगा देश।।)
5.तुम बिंलगे जउ डार-डार, हम मछई हर पात।
तुमरेउ घर की पता हइ, हमका सारी बात।
(तुम बिलँगे जो डाल डाल,हम बिलँगे हर पात।
तुमरे घर की पता है , हमको भी हर बात।)
6-का कीका कुछु मिला हइ, जग मरजादा लाँघ।
याक जाँघ की लाज बदि ,खुलइ न द्वासरि जाँघ।
(क्या कुछ किसको मिला,जग-मर्यादा लाँघ।
एक जाँघ की लाज हित,खुले न दूसर जाँघ।।)
7-अपने ते बलवान जे,मत कीन्हेउ तकरार।
नदिया ते लड़कर बहे, बिरवा बसे कगार।।
(अपने से बलवान से,मत करना तकरार।
नदिया से लड़कर बहे,पादप बसे कगार।।)
8-चहइ नहावइ नील ते,चहइ मुड़ावइ केस।
जब तक असली चाम नहिं, का बदले भा भेस।।
( भले नहाए नील से,और मुड़ाए केश।
अगर न बदली चामड़ी, व्यर्थ है बदले भेष।।)
9.बिरह अगिनि ते हइ कहूँ, कम कविताई पीर।
तपे आगि माँ तब बने,तुलसी,सूर,कबीर।।
(विरह अग्नि से कम नहीं,है कविताई पीर।
तपे आग में फिर बने,तुलसी,सूर,कबीर।।)
10-मुट्ठी भर की ज़िंदगी,चुटकी भरि आराम।
यहिमा ही करिबे परैं ,दुनिया भर के काम।।
(मुट्ठी भर की ज़िंदगी,चुटकी भर आराम।
इसमें ही करने पड़ें दुनिया भर के काम।।)
11-किरनें हरि कइ चला गा , कुहरा फिरि ई बार
हक्का - बक्का ठाढ़ हइ , सूरज थान्हेदार।।
(किरनें हरके ले गया ,कुहरा फिर इस बार।
हक्का - बक्का खड़ा है,सूरज थानेदार।।)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें