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शनिवार, 15 अगस्त 2020

डॉ संजीव कुमार


एक रूप में
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हे जग जीवन,
जन मन रंजन,
हे जनतंत्र विधाता ।
जन गण पालक, 
रक्षक, स्वामी,
अखिल जगत दुख त्राता ।।

एक दृष्टि से 
निखिल सृष्टि को
तात देखते हो तुम ।
सबके जीवन कर्मों का
प्रविधान लेखते हो तुम ।।

एक लेखनी, ह्रदय एक,
प्रक्रिया एक लेखन की,
अलग अलग क्यों
भाग्य, प्रवत्ति, वृत्ति,
भू पर जन जन की ।।

सभी तुम्हारे अंग,
अनन्य सभी से हो 
तुम स्वामी ।
इतने पृथक पृथक रूपों में
क्यों तुम अन्तर्यामी ।।

राष्ट्र भेद यह, 
क्षेत्र भेद यह,
वर्ग भेद यह क्यों है ।
अखिल विश्व में
मानवता
मानव का धर्म न क्यों है ।।

कितने धर्म, 
जातियां कितनी,
कितने वर्ण बनाये ।
एक रूप में 
हाय विधाता !
क्यों न धरा पर आये ।।

स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।।

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