ins class="adsbygoogle" style="display:block" data-ad-client="ca-pub-1379007159812977"

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

नाम: मनोहर अभय


गीत

जब से तुम को देखा 
नींद नहीं  आई 
रात उदासी में गुजरी

वही पुराना लहंगा 
और ओढ़नी मैली 
धूल भरे चेहरे  पर 
अंजन रेखा फैली 

सिर पर सौ- सौ ईंटें  
देह इकहरी ठठरी 

सीलन भरी तंग कोठरी
नहीं खिड़कियाँ  दरवाजे 
फटे टाट का पर्दा हिलता 
हवा बजाती बाजे 

सिमटे- बटुरे सोएं लिपटे
ज्यों बंधी हुई गठरी 

खुले गटर से पानी लाते 
बिटिया सुबह नहाये 
खुली -अधखुली देह देख कर 
मालिक बड़ा अघाए

बेटा मारे   पीछे से 
छोटी- बड़ी कंकरी 

नए भोर की बातें  
हुई पुरानी खोटी 
तीन ईंट का चूल्हा 
थाली बड़ी, रोटियाँ छोटी 
धुआँ उगलती ढिबरी  

गिरवी धरीं सुनहरी रातें
कैसे इन्हें छुड़ाएँ
बंधुआ जीवन यही कहानी 
किसको बैठ सुनाएँ 
  
देह माँगता ठेके वाला 
लुटी लाज की दिहरी

मेले -ठेले सर्कस- झूले 
देखे नहीं बजार  
सपनों में कट रही जिंदगी 
खुले न सुख के द्वार 

बहिन बेटियाँ कब पहनेंगीं 
साड़ी उजरी- उजरी |

©डॉ.मनोहर अभय
मौलिक

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक मजदूर महिला की मुफलिसी और उसकी व्यथा कथा को बेहतरीन शब्दावली के साथ उकेरा है इस गीत में आपने। आपकी लेखनी को नमन।

    जवाब देंहटाएं
  2. टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं